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पड़ोस का संकट चीनी चाल तो नहीं!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: November 5, 2018 18:29 IST

भारत के पड़ोसी देशों की व्यवस्थाओं से जुड़ी तस्वीर देखें तो वह बेहद चिंताजनक नजर आएगी। भारत के पड़ोसी देशों की व्यवस्थाएं मूल रूप से तीन प्रकार की विशेषताओं से संपन्न देखी जा सकती हैं- स्थायित्व का संकट, राजनीति का संकटापन्न और चीनी कर्ज के कारण आर्थिक संकट से सन्निकटता। 

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रहीस सिंह 

किसी भी देश की सुरक्षा, समृद्धि और प्रगति में उसके पड़ोसियों की स्थिति, प्रकृति एवं व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कारण यह है कि वे ‘रिंग फेंस’ (सुरक्षात्मक घेरा) के रूप में भी प्रयुक्त हो सकते हैं, एक अवरोधक दीवार भी बन सकते हैं और किसी दुश्मन देश के शतरंज के मोहरे के रूप में भी। कह सकते हैं कि राष्ट्रीय हितों के विशाल क्षितिजों को तलाशने और उन्हें स्थायी आधार देने में पड़ोसी देश एक स्थायी व निर्णायक चर (वैरिएबल) की भूमिका में होते हैं। लेकिन भारत इस मामले में खुश किस्मत नहीं रहा। कभी भारत के ही अभिन्न भाग रहे कुछ देश सर्वाधिक चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। यह प्रश्न उन स्थितियों में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब चीन एक विस्तारवादी शक्ति के रूप में इन देशों में हस्तक्षेप कर अपने प्रभाव वाली व्यवस्थाओं का निर्माण कर भारतीय हितों को काउंटर कर रहा हो।

भारत के पड़ोसी देशों की व्यवस्थाओं से जुड़ी तस्वीर देखें तो वह बेहद चिंताजनक नजर आएगी। भारत के पड़ोसी देशों की व्यवस्थाएं मूल रूप से तीन प्रकार की विशेषताओं से संपन्न देखी जा सकती हैं- स्थायित्व का संकट, राजनीति का संकटापन्न और चीनी कर्ज के कारण आर्थिक संकट से सन्निकटता। 

पाकिस्तान को यदि छोड़ दें क्योंकि वह घोषित रूप से चीन का सदाबहार मित्र है, तो भारत के अन्य पड़ोसी देशों में चीन ‘सॉफ्ट पावर’, रणनीतिक व कूटनीतिक चालों के जरिए नेपाल, मालदीव, श्रीलंका में पॉलिटिकल स्टैब्लिशमेंट को अपने उद्देश्यों के अनुसार स्थापित करने में सफल हो रहा है। जबकि भारत का प्रयास होता है कि वह मुनरो सिद्धांत के आधार पर अपने पड़ोसी देशों में किसी तीसरी शक्ति को सक्रिय न होने दे। 

यह प्रतिस्पर्धा पड़ोसी देशों को एक खेल का मैदान बना दे रही है जहां दोनों देश चित और पट का खेल खेल रहे हैं। अपने पड़ोसी देशों में पिछले एक से दो वर्ष में हुए घटनाक्रम को देखें तो चीन पहले श्रीलंका में असफल हुआ, नेपाल में सफल हुआ और मालदीव में सफल हुआ। अब लेकिन वह श्रीलंका में पुन: सफल होता दिख रहा है और मालदीव में असफल। क्या यह दक्षिण एशिया की नियति का परिणाम है या फिर भारतीय विदेश नीति में दूरदर्शिता और पैनेपन की कमी का परिणाम?

भारत के पड़ोसी देशों में जिस तरह के राजनीतिक परिवर्तन दिख रहे हैं उनमें एक खास किस्म की समानता है। उनका मंचन भले ही काठमांडू, माले या कोलम्बो में हो रहा हो लेकिन उनकी पटकथा कहीं और लिखी जा रही है।

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