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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: शिक्षा और चिकित्सा पर करें पर्याप्त खर्च

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: July 9, 2022 15:13 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंग्रेजों की औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की दो-टूक आलोचना करते हुए देश भर के शिक्षाशास्त्रियों से अनुरोध किया कि वे भारतीय शिक्षा प्रणाली को शोधमूलक बनाएं ताकि देश का आर्थिक और सामाजिक विकास तीव्र गति से हो सके।

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ठळक मुद्देदेश में शिक्षा का ढांचा वही है, जो लगभग 200 साल पहले अंग्रेजों ने भारत पर थोपा थादेश के कितने नेता सिर्फ डिग्रीधारी हैं और कितने सचमुच पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी है?नेता नौकरशाह की बात मानने हैं और नौकरशाह सेवा नहीं बल्कि शासन के लिए कुर्सी पकड़े रहते हैं

वाराणसी में अखिल भारतीय शिक्षा समागम में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंग्रेजों की औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की दो-टूक आलोचना की और देश भर के शिक्षाशास्त्रियों से अनुरोध किया कि वे भारतीय शिक्षा प्रणाली को शोधमूलक बनाएं ताकि देश का आर्थिक और सामाजिक विकास तीव्र गति से हो सके।

प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही बात कही है। पिछले 75 साल से देश में शिक्षा का ढांचा वही है, जो लगभग 200 साल पहले अंग्रेजों ने भारत पर थोप दिया था। उनकी शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ क्लर्कों की जमात खड़ी करना था। आज भी वही हो रहा है।

देश के कितने नेता सिर्फ डिग्रीधारी हैं और कितने सचमुच पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी है? इसीलिए वे नौकरशाहों की बात मानने के लिए बाध्य होते हैं। हमारे नौकरशाह भी सेवा नहीं, हुकूमत के लिए कुर्सी पकड़ते हैं। यही कारण है कि भारत में वैसे तो लोकतंत्र कायम है लेकिन असलियत में औपनिवेशिकता हमारे अंग-प्रत्यंग में रमी है।

अस्पतालों की संख्या 70 प्रतिशत बढ़ गई है लेकिन इन अस्पतालों की हालत क्या है और इनमें किन लोगों को इलाज की सुविधा है? अंग्रेजों की बनाई इस चिकित्सा-पद्धति को, यदि वह लाभप्रद है तो स्वीकार जरूर किया जाना चाहिए लेकिन कोई यह बताए कि आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी, हकीमी-यूनानी चिकित्सा-पद्धतियों का 75 साल में कितना विकास हुआ है?

उनमें अनुसंधान करने और उनकी प्रयोगशालाओं पर सरकार ने कितना ध्यान दिया है? पिछले सौ साल में पश्चिमी एलोपैथी ने अनुसंधान के जरिये अपने आपको बहुत आगे बढ़ा लिया है और उसकी तुलना में सारी पारंपरिक चिकित्साएं फिसड्डी हो गई हैं।

यदि हमारी सरकारें शिक्षा और चिकित्सा के अनुसंधान पर ज्यादा ध्यान दें और इन दोनों बुनियादी कामों को स्वभाषा के माध्यम से करें तो अगले कुछ ही वर्षों में भारत दुनिया के उन्नत राष्ट्रों की कतार में खड़ा हो सकता है। यदि शिक्षा और चिकित्सा, दोनों सस्ती और सुलभ हों तो देश के करोड़ों लोग रोजमर्रा की ठगी से तो बचेंगे ही, भारत शीघ्र ही महाशक्ति और महासंपन्न भी बन सकेगा।

टॅग्स :एजुकेशननरेंद्र मोदीशिक्षा मंत्रालय
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