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उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के सबक, भारत डोगरा का ब्लॉग

By भारत डोगरा | Updated: July 15, 2021 15:38 IST

जिला पंचायत अध्यक्ष व ब्लाक प्रमुख के चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत में बदल दिया गया.  चुनाव पूरा होने के बाद स्थिति यह थी कि 75 में से 67 पद भाजपा ने प्राप्त किए.

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ठळक मुद्देसपा या बसपा सत्ता में थे उस समय भी हुआ है, पर इस बार यह बहुत अधिक हुआ. ग्रामीण विकेंद्रीकरण व लोकतंत्र की कितनी गंभीर क्षति होती है. विशेष दल गठित कर उत्तर प्रदेश के हाल के चुनावों का एक समग्र अध्ययन करना चाहिए.

उत्तर प्रदेश में ब्लाक प्रमुखों के चुनावों की घोषणा के साथ अप्रैल से चल रही पंचायती राज चुनाव प्रक्रिया पूरी हुई. इस चुनाव के परिणामों के कुछ पक्ष ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है.

चुनाव के आरंभिक दौर में जब आम लोगों या गांववासियों द्वारा वोट देने के परिणाम घोषित हुए, उस समय समाजवादी पार्टी स्पष्ट रूप से नंबर-एक पर व भाजपा नंबर -दो स्थान पर नजर आई. इसके शीघ्र बाद जुलाई के पहले दस दिनों में जिला पंचायत अध्यक्षों व ब्लाक प्रमुखों के चुनाव हुए जो मतदाताओं के प्रत्यक्ष वोट से न होकर उनके द्वारा पहले से चुने गए सदस्यों के अप्रत्यक्ष वोट से होते हैं.

चूंकि इन दोनों चुनावों में बहुत सीमित संख्या में मतदाता होते हैं, अत: इनमें धन व बल का उपयोग अधिक आसानी से हो सकता है. कुछ मतदाताओं को खरीदा जा सकता है तो कुछ को धमकाया जा सकता है. कुछ उम्मीदवारों को भी लालच द्वारा या डरा-धमका कर चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है. इन अनुचित हथकंडों का उपयोग इससे पहले भी हुआ.

जब सपा या बसपा सत्ता में थे उस समय भी हुआ है, पर इस बार यह बहुत अधिक हुआ और इस हद तक हुआ कि पहले जनता के प्रत्यक्ष वोट में जो रुझान समाजवादी पार्टी के पक्ष में देखा जा रहा था, उसे जिला पंचायत अध्यक्ष व ब्लाक प्रमुख के चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत में बदल दिया गया.  चुनाव पूरा होने के बाद स्थिति यह थी कि 75 में से 67 पद भाजपा ने प्राप्त किए.

सवाल यह है कि इस तरह की प्रवृत्तियों से ग्रामीण विकेंद्रीकरण व लोकतंत्र की कितनी गंभीर क्षति होती है. चूंकि उत्तरप्रदेश का भारत की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, अत: लोकतंत्र की यह क्षति और भी अधिक महत्वपूर्ण है. अगले वर्ष के आरंभिक दिनों में उत्तरप्रदेश में विधानसभा के चुनाव होते हैं.

इससे कुछ ही समय पहले इस तरह की चिंताजनक प्रवृत्तियों का सामने आना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है. जो भी चुनाव हों, चाहे वह ग्रामीण विकेंद्रीकरण संस्थानों के हों या विधान सभा के या लोकसभा के उनमें भ्रष्टाचार, डराने-धमकाने और हिंसा को हटाने या न्यूनतम करने के पूर्ण प्रयास होने चाहिए. यदि ऐसे प्रयास होंगे, तभी तो जनता के वास्तविक रुझान, चुनाव परिणामों में व्यक्त हो सकेंगे.

फिलहाल जो जनता के प्रत्यक्ष मतदान के समय रुझान उभरे हुए थे, उन्हें नजरअंदाज तो कतई नहीं किया जा सकता है. उसके साथ यह जरूरी है कि पंचायती राज संस्थानों में व उनके चुनावों में भ्रष्टाचार व हिंसा व मनमानी की भूमिका न्यूनतम करने के लिए जरूरी सुधारों पर भी विचार किया जाए. देश के पंचायती राज/ग्रामीण विकेंद्रीकरण के स्वतंत्र विशेषज्ञों को एक विशेष दल गठित कर उत्तर प्रदेश के हाल के चुनावों का एक समग्र अध्ययन करना चाहिए.

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