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अच्छे कामों के लिए नौकरशाही की हौसला अफजाई भी जरूरी

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 24, 2026 07:33 IST

असामाजिक तत्वों और अवैध खननकर्ताओं द्वारा उन्हें रोकने वाले अधिकारियों की हत्या की जा चुकी है. वनों की रक्षा के दौरान वन अधिकारियों पर हमले हो रहे हैं.

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अभिलाष खांडेकर

इस सप्ताह के आरंभ में देश ने सिविल सेवा दिवस मनाया. औपचारिक समारोह आयोजित किए गए और अधिकारियों को उनके संबंधित क्षेत्रों में असाधारण कार्य के लिए सम्मानित किया गया. निःसंदेह, मेधावी और ईमानदार अधिकारियों को सरकारों द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत करना  चाहिए. लेकिन क्या वे दूसरों को प्रेरित कर पाते हैं?

आज अधिकारियों में देखने को मिल रहे बेतहाशा लालच को देखते हुए मुझे इस पर संदेह है. कोई भी भ्रष्टाचार-निरोधक एजेंसी छोटी मछलियों को पकड़ने में भी सक्षम नहीं है, बड़े मगरमच्छों की तो बात ही छोड़िए. ऐसे परिदृश्य में नौकरशाही पर बातें करना जरूरी हैं.

कुछ साल पहले  मैंने नौकरशाही पर एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘जंग लगता स्टील का ढांचा’. नौकरशाही में मेरे कई दोस्तों ने तब मुझसे नाराजगी जताई थी, हालांकि मैंने अधिकारियों की मनमानी के उन उदाहरणों का हवाला दिया था जो सबके सामने थे. उस लेख का लहजा स्पष्ट रूप से सभी सेवाओं के नौकरशाहों के खिलाफ था, न कि केवल आईएएस अफसरों के खिलाफ. मैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में मेरे कई दोस्त आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के युवा और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली सार्वजनिक सेवाओं में लगातार गिरावट देख रहे हैं.

उनसे नीचे के राजस्व अधिकारियों (पटवारी और तहसीलदार) और निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों की स्थिति तो कल्पना से परे है. हालात बहुत तेजी से बिगड़ रहे हैं और जवाबदेही का नामोनिशान मिटता जा रहा है. लोक निर्माण, सिंचाई, बिजली, बांध निर्माण, सेतु निगम जैसे निर्माण विभागों में ऐसे बड़े अधिकारी हैं जो निविदाओं में ही हेराफेरी करके करोड़पति बन गए हैं, लेकिन कोई उन्हें छू नहीं सकता.

आप कारोबारी जगत के किसी भी व्यक्ति से या नगर निगम या विकास एजेंसी से कानूनी तौर पर कोई काम करवाने वाले सामान्य नागरिकों से पूछिए, तो वे कहेंगे, ‘बिना पैसे दिए सरकार में तो कोई काम होता ही नहीं है.’ क्या इससे विकसित भारत-2047 का सपना साकार हो पाएगा?

प्रशासनिक अकादमी के एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में, मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के पद से सेवानिवृत्त हुए एक पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी का सामना एक कनिष्ठ अधिकारी से हुआ : ‘महोदय, आपने अपने भाषण में सेवा के दौरान पैसा कमाने के तरीकों के बारे में कुछ भी नहीं बताया?’ पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी इस सवाल से पूरी तरह से स्तब्ध रह गए. उन्होंने  स्वयं मुझे अपना चौंकाने वाला अनुभव बताया. मूल्यों पर आधारित सेवाओं में तेजी से गिरावट, कार्यकुशलता के स्तर में कमी, वरिष्ठ अधिकारियों का कम होता भय और समस्त अधिकारियों का बढ़ता अहंकार सभी को दिखाई दे रहा है. अचल संपत्ति और सोने सहित अन्य तरह की रिश्वत के प्रति उनका अभूतपूर्व प्रेम कई राज्यों में आम है.  

जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा था, मध्यप्रदेश के शिवपुरी में भाजपा के एक विधायक ने एक युवा आईपीएस अधिकारी (एसडीओपी) को धमका रखा था. एसडीओपी आयुष जाखड़ को विधायक प्रीतम लोदी ने उनके बेटे के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने और निर्दोष लोगों को घायल करने के मामले में की गई कानूनी कार्रवाई के लिए धमकी दी है. इस घटना से पुलिस बल में हलचल मच गई.

इससे मुझे नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़ा. मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूं कि लोक सेवक होने के नाते अधिकारियों को जनता के प्रति सहानुभूति और हमदर्दी दिखानी चाहिए, लेकिन समाज और राजनेताओं को भी अधिकारियों के साथ शालीनता से पेश आना चाहिए. भ्रष्टाचारियों को, कानून तोड़ने वालों को निर्दयता से बेनकाब किया जाना चाहिए, लेकिन जो लोग ईमानदारी से और संविधान एवं कानूनों के अनुसार कर्तव्य निभा रहे हैं, उन्हें कतई निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. असामाजिक तत्वों और अवैध खननकर्ताओं द्वारा उन्हें रोकने वाले अधिकारियों की हत्या की जा चुकी है. वनों की रक्षा के दौरान वन अधिकारियों पर हमले हो रहे हैं.

पूर्व कैबिनेट सचिव अजीत सेठ ने लिखा था, ‘चुनी हुई सरकार और नागरिकों के बीच संपर्क सूत्र के रूप में, नौकरशाह प्रशासन के पहियों को सुचारु रूप से चलाते हैं और उनके बिना चीजें ‘आगे नहीं बढ़ सकतीं’. वास्तव में, वे सही थे, लेकिन अब  नौकरशाह उनकी संदिग्ध निष्पक्षता, स्वार्थी दृष्टिकोण और अक्षमता के साथ-साथ राजनीतिक अनुग्रह के जरिये महत्वपूर्ण पदों को हथियाने के लिए ज्यादा जाने लगे हैं.  

ऐसे बहुत कम अधिकारी हैं जो पैसा कमाने और मनचाहे पद पाने की होड़ में शामिल होने से इनकार करते हैं. संविधान का पालन करने वाले, राजनीतिक दबावों को नकारने वाले निडर व   ईमानदार बने रहने वालों को ही ऐसे दिनों पर सम्मानित किया जाना जरूरी है. अन्यथा यह दिवस निरर्थक रस्म बना रहेगा और समाज न्याय का मुंह ताकता रह जाएगा. 

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