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यूपी चुनावः उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता बंटने को तैयार नहीं, 21 फीसदी से ज्यादा दलित वोट पर नजर, जानें समीकरण

By अभय कुमार दुबे | Updated: December 15, 2021 11:09 IST

सीएसडीएस-लोकनीति के अनुसंधानकर्ता राहुल वर्मा और प्रणव गुप्ता ने बिहार चुनाव का अध्ययन करके बताया था कि लालू-नीतीश के महागठबंधन की सामाजिक शक्तियों के साथ मुसलमान वोटरों के गठजोड़ ने नीतीश कुमार की शानदार जीत सुनिश्चित की. दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ था.

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ठळक मुद्देभाजपा उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों का बिहार और दिल्ली की तर्ज पर कोई भाजपा विरोधी सामाजिक गठजोड़ रोकना चाहती थी.अमित शाह ने छह महीने पहले ही यह कहना शुरू कर दिया था कि उनकी मुख्य टक्कर समाजवादी पार्टी से है. 21 फीसदी से ज्यादा दलित वोट और 18 फीसदी से ज्यादा मुसलमान वोट मिलकर जिताऊ गठजोड़ बनाते हैं.

उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव (2017) में मुसलमान वोटों को बांटने के लिए भाजपा ने काफी दांव-पेंच किए थे. उस चुनाव में राजनीतिक परिस्थिति आज के मुकाबले भिन्न थी. 2015 में भाजपा दिल्ली और बिहार के चुनावों में जबरदस्त रूप से मुंह की खा चुकी थी.

 

अगर मुसलमानों के वोट-रुझानों का अध्ययन किया जाए तो पहली नजर में स्पष्ट हो जाता है कि इन चुनावों में वे रणनीतिक रूप से चुनाव-क्षेत्र स्तर पर अन्य सामाजिक समूहों के साथ भाजपा विरोधी गठजोड़ बनाने में कामयाब रहे थे. इसलिए उनका भाजपा विरोधी वोट प्रभावी साबित हो गया था.

सीएसडीएस-लोकनीति के अनुसंधानकर्ता राहुल वर्मा और प्रणव गुप्ता ने बिहार चुनाव का अध्ययन करके बताया था कि लालू-नीतीश के महागठबंधन की सामाजिक शक्तियों के साथ मुसलमान वोटरों के गठजोड़ ने नीतीश कुमार की शानदार जीत सुनिश्चित की. दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ था.

आम आदमी पार्टी का समर्थन करने वाले गरीब तबकों (वैसे दिल्ली के मुसलमान भी गरीब तबकों में ही आते हैं) के साथ जुड़कर मुसलमानों ने संकल्प के साथ भाजपा विरोधी वोट दिए और नतीजे के तौर पर भाजपा की सीटें तीन रह गईं. यही मुसलमान वोटर 2014 के लोकसभा चुनाव में आप और कांग्रेस के बीच बंट गए थे, नतीजे के तौर पर भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें जीत ली थीं.

इसी वजह से भाजपा उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों का बिहार और दिल्ली की तर्ज पर कोई भाजपा विरोधी सामाजिक गठजोड़ रोकना चाहती थी. इसीलिए अमित शाह ने छह महीने पहले ही यह कहना शुरू कर दिया था कि उनकी मुख्य टक्कर समाजवादी पार्टी से है. दरअसल, उन्हें डर था कि कहीं मुसलमान बसपा की तरफ न चले जाएं.

ऐसा होने की सूरत में भाजपा का जीतना नामुमकिन हो जाता, क्योंकि 21 फीसदी से ज्यादा दलित वोट और 18 फीसदी से ज्यादा मुसलमान वोट मिलकर जिताऊ गठजोड़ बनाते हैं. अगर हर निर्वाचन क्षेत्र में ऐसा गठजोड़ बनता हुआ दिखता तो बसपा के पक्ष में हवा तैयार होती जिसके प्रभाव में फ्लोटिंग या तरल वोट भी इस पार्टी को मिल सकते थे.

भाजपा स्वयं चाहती थी कि मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट देकर निष्प्रभावी हो जाएं. स्थिति ही ऐसी थी. समाजवादी पार्टी के भीतर जबरदस्त कलह चल रही थी. भाजपा का ख्याल था कि इस पार्टी का यादव समर्थन आधार भी अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल के बीच बंट जाएगा इसलिए मुसलमान वोटर कुछ खास असर नहीं डाल पाएंगे.

इस बार स्थिति अलग है. अखिलेश ने धीरे-धीरे यादव समाज में अपनी पैठ को इतना बढ़ा लिया है कि शिवपाल केवल एक छोटे से क्षेत्र में थोड़े-बहुत ही प्रभावी रह गए हैं. इसीलिए शिवपाल के साथ गठजोड़ करने में अखिलेश को खास दिलचस्पी नहीं है. इसके उलट उनकी कोशिश यह है कि किसी तरह वे अतिपिछड़ी जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधियों को समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ लें.

इस रणनीति का परिणाम यह निकला है कि भाजपा से निराश अतिपिछड़े समाज ने उनके साथ जुड़कर समाजवादी पार्टी को भाजपा का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बना दिया है. यह संदेश मुसलमान वोटरों के पास गया है और उन्हें लग रहा है कि केवल अखिलेश की पार्टी ही भाजपा को शिकस्त दे सकती है. इसलिए ओवैसी की मौजूदगी होते हुए भी वे खामोशी से समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े हुए दिख रहे हैं.

यह स्थिति इसके बावजूद है कि इस बार प्रदेश में हैदराबाद से आई मुसलमानों की पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआई एमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी भी अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे. अतीत में मुसलमान मतदाता एक हद तक बसपा को भी पसंद करते रहे हैं.

तीसरी तरफ कांग्रेस भी उनके वोटों की दावेदार रहती है, और मुसलमान समाज के भीतर एक छोटा सा हिस्सा ऐसा भी है जो कांग्रेस के साथ जज्बाती रूप से जुड़ा महसूस करता है. यानी, मुसलमान वोटों के बंटने की जमीन पूरी तरह से तैयार है. इसके बावजूद अगर मुसलमान वोटर बंटने से इनकार करते हुए दिख रहे हैं तो यह न केवल उनकी राजनीतिक परिपक्वता की निशानी है.

बल्कि इससे वह संकल्प भी प्रगट होता है जिसके तहत वे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करना चाहते हैं. पिछले चुनाव में भाजपा ने चालीस फीसदी से कुछ ज्यादा हिंदू वोटों की गोलबंदी करके मुसलमान वोटों की प्रभावकारिता को शून्य कर दिया था. ऊपर से मुसलमान वोट बंट भी गए थे.

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