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आर्टेमिस-2 : चांद पर नासा की नई उड़ान से जुड़े हैं कई मकसद

By अभिषेक कुमार सिंह | Updated: April 17, 2026 07:27 IST

नासा का आर्टेमिस मिशन और भारत-चीन के अपने चंद्र अभियान नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले हैं.

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धरती पर अगर एवरेस्ट मानव पराक्रम की सर्वोच्च चुनौती है तो नजदीकी अंतरिक्ष में चांद को हासिल करना इंसानी पराक्रम की पहली और सबसे जटिल परीक्षा है. इसका सपना विज्ञान, तकनीक और जिजीविषा के बल पर आगे बढ़ने वाला हर देश देखता है. सिर्फ नए देश ही नहीं, बल्कि जो देश इस पराक्रम में अपनी श्रेष्ठता साबित कर चुका है, उसे भी चांद नए सिरे से मोहित कर रहा है. बात अमेरिका और उसकी स्पेस एजेंसी नासा की है, जिसके मिशन आर्टेमिस-2 पर चार अंतरिक्ष यात्री हाल ही में चांद की सफल परिक्रमा करके लौटे हैं.

नौ दिन का साहसिक सफर करके 11 अप्रैल 2026 को पृथ्वी पर सकुशल लौटा यह मिशन न केवल अमेरिकी स्पेस एजेंसी के लिए बल्कि समूची मानवता के लिए एक यादगार उपलब्धि है. चांद पर पदार्पण करने के पांच दशक बाद इंसान चांद के इतने करीब पहुंचा, जितना पहले कभी नहीं पहुंचा था. 2,52,756 मील (लगभग 4,06,771 किमी) की दूरी तय करके आर्टेमिस-2 ने इंसानी इतिहास में नया कीर्तिमान बनाया है.

पर सवाल है कि हमें चांद की जरूरत ही क्या है? इतिहास देखें तो पता चलता है कि पहली बार 1969 में नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन अपोलो-11 से और आखिरी बार दिसंबर 1972 में अपोलो-17 के कमांडर यूजीन सेर्नन और हैरिसन श्मिट चांद की सतह पर उतरे थे. वर्ष 1969 से 1972 के बीच नासा के सात अपोलो मिशनों में से छह सफल रहे और कुल 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्र-सतह पर चहलकदमी की. लेकिन वर्ष 1969 के बाद कोई मानव चांद की सतह पर नहीं उतरा है. बीते कुछ वर्षों में भारत और चीन के मून मिशनों की सनसनी अवश्य रही है. मसलन भारत ने चंद्रयान-1 से पानी की खोज की, चंद्रयान-3 से दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग का विश्व रिकॉर्ड बनाया.

चीन ने चांग’ई-6 से चांद के दूर वाले हिस्से से नमूने लाकर इतिहास रचा और 2030 तक मानव मिशन का लक्ष्य रखा है. लेकिन आर्टेमिस-2 ने दिखा दिया कि नासा अब भी इस दौड़ में सबसे आगे है. खुद नासा के आर्टेमिस मिशन का अंतिम उद्देश्य वर्ष 2030 तक अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र-सतह पर दोबारा उतारना है.  

आर्टेमिस-2 ने वैज्ञानिक, आर्थिक और प्रेरणादायक तीनों आयामों को छुआ. चांद पर 60 करोड़ टन पानी जमी बर्फ के रूप में मौजूद है. हीलियम-3 की मात्रा खरबों डॉलर की है. एक चौथाई हिस्सा भी पृथ्वी लाया गया तो 500 वर्ष की ऊर्जा जरूरत पूरी हो सकती है. रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर्यावरण-हितैषी तरीके से निकाले जा सकते हैं. चांद को रीफ्यूलिंग स्टेशन बनाकर मंगल और उससे आगे की यात्राएं आसान हो जाएंगी. पृथ्वी से रॉकेट छोड़ने की अधिकांश ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडल पार करने में खर्च होती है.

चांद से ईंधन लेकर यात्रा करने से यह बाधा दूर हो जाएगी. जहां तक आर्टेमिस मिशन की वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात है, तो ये सफलताएं अनगिनत हैं. जैसे कि अंतरिक्ष यात्री चांद के 100 किमी के अंदर फ्लाईबाई करके डीआरओ ऑर्बिट में पहुंचे. यहां से उन्होंने सौर विकिरण, चांद की सतह की संरचना और भविष्य की लैंडिंग साइट्स के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई. क्रू ने कई सालों की तैयारी के बाद लूनर साइंस का गहरा अध्ययन किया और नासा को नए इनपुट दिए.

असल में, आर्टेमिस-2 ने 93 अरब डॉलर के खर्च और हजारों वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों की वर्षों की मेहनत को सार्थक साबित किया. हमें नहीं भूलना होगा कि नासा का यह मिशन भारत और चीन के रोबोटिक प्रयासों से भी प्रेरित था. भारत के चंद्रयान और चीन के चांग’ई नामक मिशन खुद नासा को यह प्रेरणा दे रहे हैं कि अमेरिका फिर से इंसान को चांद पर उतारे.

अगले चरण में नासा की योजना आर्टेमिस-3 से अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चांद की सतह पर उतारने की है. आने वाले वक्त में मंगल पर इंसान भेजने का लक्ष्य भी इसी आधार पर टिका है. नासा का आर्टेमिस मिशन और भारत-चीन के अपने चंद्र अभियान नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले हैं. ये अभियान साबित करते हैं कि हर किस्म के युद्ध और संघर्ष से ऊपर मानवता की बड़ी मंजिलें हैं. अगर अमेरिका खुद को ऐसे महान अभियानों में संलग्न करता है और युद्धों से अलग करता है, तो वे मिसालें ज्यादा सार्थक और प्रेरक कही जाएंगी.

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