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UP Assembly Elections 2022: यूपी में बाजी पलटेगी या पलटते-पलटते रह जाएगी?, जानें क्या है आंकड़े

By अभय कुमार दुबे | Updated: February 24, 2022 15:30 IST

UP Assembly Elections 2022: उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 विधानसभा सीट हैं. मुख्य मुकाबला भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा में है.

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ठळक मुद्देयादव-मुस्लिम गठजोड़ को गैर-यादव पिछड़े वोटों का कितना बड़ा हिस्सा मिलेगा.बिहार में भी तेजस्वी यादव को इस तरह की चर्चा और हवा का लाभ मिला था.उत्तर प्रदेश का चुनाव दो बड़े सामाजिक गठजोड़ों की आपसी होड़ में बदलता जा रहा है.

UP Assembly Elections 2022: जहां तक चर्चा और हवा का सवाल है, उत्तर प्रदेश में चर्चा सबसे ज्यादा इस बात की हो रही है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में भाजपा को मिलने वाली चुनौती किस तरह से बढ़ती जा रही है.

लेकिन इस प्रश्न का कोई ठोस और सुनिश्चित जवाब नहीं मिल पा रहा है कि उनके यादव-मुस्लिम गठजोड़ को गैर-यादव पिछड़े वोटों का कितना बड़ा हिस्सा मिलेगा और क्या जाटों के साठ-सत्तर फीसदी वोट भी साइकिल या हैंडपंप पर पड़े होंगे. ये तमाम वोट पिछले तीन चुनावों से भाजपा के खाते में जा रहे थे. यह एक नई बात है कि भाजपा हवा बनाने में समर्थ नहीं हो पा रही है.

क्या उसका मतदाता चुप है? बिहार में भी तेजस्वी यादव को इस तरह की चर्चा और हवा का लाभ मिला था, लेकिन नीतीश कुमार के मतदाताओं ने चुप रहने के बावजूद सरकार का साथ देना पसंद किया था. क्या उत्तर प्रदेश बिहार को दोहाराएगा जहां तेजस्वी बाजी पलटते-पलटते रह गए थे? या उ.प्र. बाजी पलट कर ही मानेगा?  

पहले दो दौर के मतदान के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव दो बड़े सामाजिक गठजोड़ों की आपसी होड़ में बदलता जा रहा है. एक तरफ भाजपा के नेतृत्व में ऊंची जातियों की गोलबंदी हो रही है, तो दूसरी ओर यादव और मुसलमान वोटरों की असाधारण एकता दिखाई पड़ रही है.

चुनाव शास्त्री उप्र को चार क्षेत्रों में बांट कर समझते हैं-पश्चिमी उप्र (इसमें रुहेलखंड को भी जोड़ लिया जाता है), अवध, बुंदेलखंड और पूर्वी उत्तरप्रदेश. चारों की सामाजिक संरचनाएं और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं. इसलिए इन दो सामाजिक गठजोड़ों में क्षेत्र और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से सामुदायिक समर्थन या तो पूरी तरह से जुड़ रहा है, या जुड़ने से इंकार कर रहा है, या फिर विभाजित होकर दोनों तरफ बंट रहा है.

मसलन, पश्चिमी उप्र में मुस्लिम-यादव गठजोड़ ने किसान आंदोलन से पैदा हुई परिस्थितियों के कारण भाजपा के साथ संपूर्ण रूप से जुड़े रहे जाट वोटर का एक बड़ा हिस्सा छीन लिया है. इसी तरह समझा जा रहा है कि पूर्वी उप्र में पंडितों का कम से कम एक छोटा हिस्सा तो स्थानीय प्रभाव में इस गठजोड़ के साथ जाएगा ही जाएगा.

दूसरी तरफ भाजपा के गठजोड़ को उम्मीद है कि उसकी सरकार द्वारा बनाए गए ‘लाभार्थी’ उसके गठजोड़ के साथ जुड़ेंगे. न केवल यह बल्कि उसे यह भी लगता है कि आदित्यनाथ सरकार की ‘ठोंको नीति’ (अपराधी तत्वों को एनकाउंटर के जरिये साफ कर देने की नीति) के कारण आबादी के एक बड़े हिस्से की हमदर्दियां पार्टी के साथ रहेंगी.

यह चर्चा उस समय तक पूरी नहीं हो सकती जब तक ‘फटे हुए वोट’ की परिघटना पर गौर न कर लिया जाए. यह परिघटना उस समय प्रभावी होती है जब राजनीतिक दलों द्वारा पूरी तरह से अपना समर्थक बनाने के प्रयासों के बावजूद समुदायों की मतदान संबंधी निष्ठाएं बंट जाती हैं. किसी समुदाय के वोट किन्हीं दो राजनीतिक ताकतों के बीच साठ-चालीस या उसके आसपास के अनुपात में बंट जाएं तो यह कहा जा सकता है कि वहां ‘फटे हुए वोट’ की परिघटना अपना काम कर रही है. ध्यान रहे कि ‘फटे हुए वोट’ और ‘वोट-कटवा’ दो अलग-अलग बातें हैं.

वोट-कटवा उम्मीदवार और पार्टियां ज्यादा से ज्यादा निर्वाचन-क्षेत्र के स्तर पर ही प्रभावी हो पाती हैं. इसका उदाहरण असदुद्दीन ओवैसी के ‘वोट-कटवा’ उम्मीदवारों के रूप में देखा जा सकता है. वे बिहार के सीमांचल इलाके की कुछ सीटों पर ही प्रभावी हो सके थे, अन्यथा बिहार के मुसलमान मतदाताओं ने तेजस्वी और उनकी पार्टी के लिए ‘साबुत वोट’ की भूमिका ही निभाई थी.

मेरा विचार है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव ‘फटे हुए वोट’ की परिघटना के लिए जाने जाएंगे. इसका मुख्य कारण होगा विभिन्न परिस्थितियों के कारण 2017 और 2019 में भाजपा द्वारा तैयार किए गए ‘हिंदू वोट’ का एक हद तक छिन्न-भिन्न हो जाना. प्रदेश स्तर पर इसका एक और कारण बसपा के ग्राफ में लगातार हो रही गिरावट के रूप में भी देखा जा सकता है.

पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा को जाट, गूजर, सैनी, राजभर, मौर्य, कुर्मी, निषाद, लोधी, नौनिया-चौहान, बिंद जैसी विभिन्न बिरादरियों और दो बड़े समुदायों का समर्थन मिला था. इनमें एक है गैर-यादव पिछड़ों का समुदाय और एक है गैर-जाटव दलितों का समुदाय. इन दोनों ने भाजपा को  ‘साबुत वोट’ प्रदान किया था. ऊंची जातियों (ब्राह्रण, क्षत्रिय, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ) को अगर एक बड़ा समुदाय माना जाए तो उसकी भाजपा के प्रति निष्ठाएं उस समय अपने चरम पर थीं.

लेकिन इस बार इन तीनों बड़े समुदायों की निष्ठाएं पहले की तरह भाजपा से प्रतिबद्ध नहीं रह गई हैं. उनका एक हिस्सा भाजपा के साथ अभी भी जुड़ा रहेगा, लेकिन दूसरा हिस्सा अपनी मतदान-प्राथमिकताएं बदलने के मूड में प्रतीत हो रहा है.

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