डॉ. अनन्या मिश्र
भारतीय संस्कृति में नारी को आदिकाल से शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्वरूप माना गया है. अब यह सांस्कृतिक आदर्श राजनीतिक यथार्थ में रूपांतरित हो रहा है, क्योंकि अब भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक युगांतकारी नीति हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है. यह प्रतिनिधित्व का विस्तार तो है ही, साथ ही शासन प्रणाली के भीतर एक आवश्यक सुधार है जो लंबे समय से अपेक्षित था. जब निर्णय लेने वाली संस्थाओं में विविधता बढ़ती है तो नीतियां अधिक संतुलित, तथ्याधारित और समाज के विभिन्न वर्गों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप बनती हैं.
इस अधिनियम का मूल उद्देश्य यही है- लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक और कार्यक्षम बनाना. भारत में महिलाओं की जनसंख्या लगभग 48 प्रतिशत है, किंतु संसद में उनका प्रतिनिधित्व 13-14 प्रतिशत तक सीमित रहा है. यह असंतुलन नीति-निर्माण में एक स्पष्ट अंतराल उत्पन्न करता है. अधिनियम के तहत 33 प्रतिशत आरक्षण इस अंतराल को व्यवस्थित रूप से समाप्त करने का प्रयास है.
इसका प्रत्यक्ष लाभ यह होगा कि निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं के अनुभव, विशेषकर स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को संस्थागत स्थान मिलेगा. इससे नीतियों की प्राथमिकताएं अधिक यथार्थवादी और परिणामोन्मुख होंगी. संविधान के 106वें संशोधन के अंतर्गत यह अधिनियम लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें सुनिश्चित करता है.
इसका एक व्यावहारिक प्रभाव यह है कि राजनीतिक दलों को भी अपने उम्मीदवार चयन में संरचनात्मक परिवर्तन करना पड़ेगा. इससे नए सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. यह अधिनियम नारी शक्ति और ज्ञान को व्यावहारिक रूप से संबोधित करता है. जब महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं,
तो सामाजिक दृष्टिकोण भी धीरे-धीरे बदलता है क्योंकि सत्ता संरचना में उपस्थिति ही सामाजिक वैधता को जन्म देती है. इसका दीर्घकालिक प्रभाव लैंगिक समानता को संस्थागत रूप देना होगा. स्थानीय शासन के अनुभव इस नीति की व्यावहारिकता को पहले ही सिद्ध कर चुके हैं. पंचायतों में 33 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आरक्षण के बाद अनेक अध्ययनों में पाया गया कि महिला प्रतिनिधियों ने पेयजल, विद्यालय उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित किया. इसका अर्थ यह है कि प्रतिनिधित्व में बदलाव सीधे नीति-प्राथमिकताओं को प्रभावित करता है.
आर्थिक दृष्टि से भी यह अधिनियम तर्कसंगत है. जब महिलाओं की श्रम एवं नेतृत्व में भागीदारी बढ़ती है तो अर्थव्यवस्था की उत्पादकता में वृद्धि होती है. राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस भागीदारी को नीति-स्तर पर समर्थन प्रदान करता है और इनमें कौशल विकास, उद्यमिता प्रोत्साहन और कार्यस्थल सुरक्षा भी शामिल है.
इससे महिला श्रम भागीदारी दर में वृद्धि संभव है, जो विकसित भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक है. यह नीति तीन स्तरों पर प्रभाव डालती है- पहला, प्रतिनिधित्व में सुधार, जिससे नीति-निर्माण अधिक समावेशी होता है. दूसरा, शासन की प्राथमिकताओं में बदलाव, जिससे सामाजिक क्षेत्रों में लक्षित सुधार संभव होते हैं और तीसरा, दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन, जिससे लैंगिक समानता को संस्थागत आधार मिलता है. इन तीनों प्रभावों का संयुक्त परिणाम एक अधिक संतुलित, कार्यक्षम और उत्तरदायी लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में सामने आ सकता है.