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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: पूर्वोत्तर में फौजी शिकंजे में ढील सराहनीय

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: April 2, 2022 15:43 IST

पिछले साल 4 दिसंबर को नगालैंड के मोन जिले में फौज की गोलीबारी से 14 लोगों की मौत हो गई थी। इस दुर्घटना ने उक्त कानून की वापसी की मांग को काफी तेज कर दिया था।

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केंद्र सरकार ने असम, नगालैंड और मणिपुर के ज्यादातर क्षेत्नों से अफस्पा यानी ‘आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट’ को हटाकर सराहनीय कदम उठाया है। 1958 में यह कानून नेहरू सरकार को इसलिए बनाना पड़ा था कि भारत के इन पूर्वी सीमा के प्रांतों में काफी अराजकता फैली हुई थी। कई बागी संगठनों ने इन प्रांतों को भारत से तोड़ने का बीड़ा उठा रखा था। उन्हें अपने धर्म प्रचार के नाम पर पश्चिमी मुल्क भरपूर सहायता दे रहे थे और चीन समेत कुछ पड़ोसी देश भी उनकी सक्रि य मदद कर रहे थे। इसीलिए इस कानून के तहत भारतीय फौज को असाधारण अधिकार प्रदान कर दिए गए थे। 

इन क्षेत्रों में नियुक्त फौजियों को अधिकार दिया गया था कि वे किसी भी व्यक्ति पर जरा भी शक होने पर उसे गिरफ्तार कर सकते थे, उसकी जांच कर सकते थे और उसे कोई भी सजा दे सकते थे। उन्हें किसी वारंट या एफआईआर की जरूरत नहीं थी। लगभग इन सभी राज्यों की सरकारें इस कानून को हटाने की मांग करती रही हैं। इस कानून को हटाने की मांग को लेकर मणिपुर की इरोम शर्मिला नामक महिला ने 16 वर्ष तक लगातार अनशन किया। 

यह विश्व का सबसे लंबा और अहिंसक अनशन था। हालांकि यह कानून अभी हर क्षेत्र से पूरी तरह नहीं हटाया गया है, फिर भी 60 प्रतिशत क्षेत्र इससे मुक्त कर दिए गए हैं। पिछले 7-8 सालों में उग्रवादी हिंसक घटनाओं में 74 प्रतिशत की कमी हुई है। सैनिकों की मौत में 60 प्रतिशत और नागरिकों की मौत में 84 प्रतिशत की कमी आई है। पिछले साल 4 दिसंबर को नगालैंड के मोन जिले में फौज की गोलीबारी से 14 लोगों की मौत हो गई थी। 

इस दुर्घटना ने उक्त कानून की वापसी की मांग को काफी तेज कर दिया था। सच्चाई तो यह है कि पूर्वी सीमांत के इन इलाकों में इस तरह का कानून और पुलिस का निरंकुश बर्ताव अंग्रेजों के जमाने से चल रहा था। केंद्र की विभिन्न सरकारों ने समय-समय पर इस कानून में थोड़ी-बहुत ढील तो दी थी लेकिन अब केंद्र सरकार ने इसे पूरी तरह से हटाने का रास्ता खोल दिया है। पिछले कुछ वर्षो में इन इलाकों के करीब 70000 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। 

लगभग सभी राज्यों में भाजपा या उसकी समर्थक सरकारें हैं यानी केंद्र और राज्यों के समीकरण उत्तम हैं। 2020 का बोडो समझौता और 2021 का कर्बी-आंगलोंग पैक्ट भी शांति की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह खुद इन क्षेत्रों के नेताओं के बीच काफी सक्रिय हैं। यही प्रक्रिया चलती रही तो अगले कुछ ही वर्षो में ये सीमांत के क्षेत्र भी संपन्न हो सकेंगे।

टॅग्स :अमित शाहनागालैंडअसममणिपुर
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