लाइव न्यूज़ :

पंकज चतुर्वेदी का ब्लॉग: मानसून की बारिश को त्रासदी नहीं, जीवन पर्व बनाएं

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: July 20, 2024 10:42 IST

जैसे ही प्रकृति ने अपना आशीष बरसाया और ताल-तलैया, नदी-नाले उफन कर धरा को अमृतमय करने लगे, अजीब तरह से समाज का एक वर्ग इसे जल प्रलय, हाहाकार जैसे शब्दों से निरूपित करने लगा. 

Open in App
ठळक मुद्देआषाढ़ शुरू होते ही मानसून ने अभी दस्तक दी ही थी कि भारत के जो हिस्से पानी के लिए व्याकुल थे, पानी-पानी हो गए. धरती पर इंसान का अस्तित्व बनाए रखने के लिए पानी जरूरी है तो पानी को बचाए रखने के लिए बारिश का संरक्षण ही एकमात्र उपाय है. इस समय देश के हर एक इंसान को जल देवता के अभिषेक के लिए खुद कुछ समय और श्रम देना ही चाहिए.

आषाढ़ शुरू होते ही मानसून ने अभी दस्तक दी ही थी कि भारत के जो हिस्से पानी के लिए व्याकुल थे, पानी-पानी हो गए. जैसे ही प्रकृति ने अपना आशीष बरसाया और ताल-तलैया, नदी-नाले उफन कर धरा को अमृतमय करने लगे, अजीब तरह से समाज का एक वर्ग इसे जल प्रलय, हाहाकार जैसे शब्दों से निरूपित करने लगा. 

असल में जब धरती तप रही थी, तब समाज को अपने आसपास के कुएं, बावड़ी, तालाब, जोहड़, नदी, सरिता से गंदगी साफ करना था, उसमें जम गई गाद को खेतों तक ले जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, सो जो पानी सारे साल के लिए धरती को जीवन देता, वह लोगों को कहर लगने लगा. एक बात समझना होगा कि नदी, नहर, तालाब झील आदि पानी के स्रोत नहीं हैं, हकीकत में पानी का स्रोत मानसून है या फिर ग्लेशियर. 

तालाब, नदी-दरिया आदि तो उसको सहेजने का स्थान मात्र हैं. मानसून की हम कद्र नहीं करते और उसकी नियामत को सहेजने के स्थान को गर्मी में तैयार नहीं करते, इसलिए जलभराव होता है और फिर कुछ दिन बाद जल-भंडार खाली. आज गंगा-यमुना के उद्गम स्थल से लेकर छोटी नदियों के किनारे बसे गांव-कस्बे तक बस यही हल्ला है कि बरसात ने खेत-गांव सबकुछ उजाड़ दिया. 

लेकिन जरा मानसून विदा होने दीजिए, उन सभी इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए मारा-मारी होगी. अभी सावन और भादों के महीने सामने खड़े हैं. इस समय देश के हर एक इंसान को जल देवता के अभिषेक के लिए खुद कुछ समय और श्रम देना ही चाहिए. भले ही हमने गर्मी में तैयारी नहीं की लेकिन अभी भी कोई देर नहीं हुई है, बस कुछ भीगने और हाथ-पैर में पावन मिट्टी के लिपटने को तैयार हों. 

धरती पर इंसान का अस्तित्व बनाए रखने के लिए पानी जरूरी है तो पानी को बचाए रखने के लिए बारिश का संरक्षण ही एकमात्र उपाय है. यदि देश की महज पांच प्रतिशत जमीन पर पांच मीटर औसत गहराई में बारिश का पानी जमा किया जाए तो पांच सौ लाख हेक्टेयर पानी की खेती की जा सकती है. इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी पूरे देश में दिया जा सकता है.

और इस तरह पानी जुटाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारंपरिक जल प्रणालियों को खोजा जाए, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मान दिया जाए और एक बार फिर समाज को ‘पानीदार’ बनाया जाए. तो मानसून का त्रासदी नहीं, जीवन के अनिवार्य तत्व के अवसर की तरह आनंद लें, जहां स्थान मिले, बरसात के पानी को रोकें और उसे दो-तीन दिन में धरती में जज्ब हो जाने दें.

टॅग्स :मानसूनभारत
Open in App

संबंधित खबरें

विश्वआखिर ऐसी ओछी हरकतें लगातार क्यों कर रहा है चीन ?

भारतविदेश मंत्रालय ने चीन के भारतीय क्षेत्र के नाम बदलने के कदम पर पलटवार किया, इसे एक शरारती प्रयास बताया

भारतचुनावी हिंसा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार ?

भारत'₹15,000 देते रहो और खुश रहो': सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी से 16 साल से अलग रह रहे पति की तलाक़ की अर्ज़ी ठुकराई

विश्वभारत-US संबंधों का नया अध्याय; मार्को रूबियो का भारत दौरा, क्वाड और क्रिटिकल मिनरल्स पर जोर

भारत अधिक खबरें

भारतकान खोल के सुन लो?, भारत की भूमि पर कोई माई का लाल बाबरी मस्जिद नहीं बना पाएगा?, बंगाल चुनाव से पहले अमित शाह की बड़ी चेतावनी, वीडियो

भारतNari Shakti Vandan: महिला आरक्षण बिल पर समर्थन?, कांग्रेस सहित विपक्ष के कई प्रमुख दलों ने कहा- परिसीमन प्रावधान के खिलाफ एकजुट होकर करेंगे वोट, वीडियो

भारतNari Shakti Vandan Sammelan: 16 अप्रैल को एक साथ होली-दिवाली?, 10वीं-12वीं की टॉपर छात्राओं को सीएम डॉ. मोहन ने किया सम्मानित, देखिए तस्वीरें

भारतकौन हैं विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव?, क्यों नीतीश कुमार करते हैं सबसे अधिक भरोसा?, वीडियो

भारतबिहार सरकार बंटवाराः गृह समेत 29 विभाग सम्राट चौधरी के पास, विजय कुमार चौधरी के पास 10 और बिजेंद्र प्रसाद यादव के पास 8, देखिए लिस्ट