कहना मुश्किल है कि ये मजाक है या बेशर्मी !

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 23, 2026 07:28 IST2026-04-23T07:28:46+5:302026-04-23T07:28:51+5:30

भविष्य में मिलने का सवाल है क्योंकि नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन और चयन की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और सख्त अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित होती है

It's hard to say whether this is a joke or a joke | कहना मुश्किल है कि ये मजाक है या बेशर्मी !

कहना मुश्किल है कि ये मजाक है या बेशर्मी !

यदि कोई व्यक्ति पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहां के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के लिए नोबल शांति पुरस्कार की मांग करे तो या तो आप उस व्यक्ति को सिरफिरा कहेंगे या फिर मजाक मान कर उसका मजाक उड़ाएंगे! पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन (पीएमएल-एन) की सांसद हैं फराह खान. मोहतरमा का कहना है कि शहबाज और मुनीर ने दुनिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए बड़ी मेहनत की है इसलिए उन्हें शांति का नोबल प्राइज मिलना चाहिए.

उन्होंने पाकिस्तान की खैबर पख्तूनख्वा प्रांतीय विधानसभा में एक प्रस्ताव भी पेश कर दिया है. फराह शायद यह भूल गईं कि शहबाज और मुनीर वो शख्सियत हैं जिन्होंने पाकिस्तान में आतंक की पाठशाला को मजबूती प्रदान की है. बल्कि मुनीर तो वैसी ही एक पाठशाला में पढ़ते भी थे. शहबाज और मुनीर के लिए नोबल शांति पुरस्कार की मांग करने वाला एक प्रस्ताव इसी महीने पाकिस्तान की पंजाब विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित भी हो चुका है.

आपको याद ही होगा कि शहबाज और मुनीर वही व्यक्ति हैं जिन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प को शांति का नोबल पुरस्कार देने की मांग की थी. उस समय ट्रम्प भी खुद को नोबल पुरस्कार से नवाजे जाने के लिए बेचैन हो रहे थे लेकिन उनकी हरकतें शांति का मजाक उड़ा रही थीं. वेनेजुएला और ईरान में उन्होंने जो कुछ भी किया, शांति का कोई पुजारी वैसी हरकत करता?

वैसे जहां तक ट्रम्प, शहबाज या फिर मुनीर को शांति के नोबल पुरस्कार का सवाल है तो न पहले मिलना था और न ही भविष्य में मिलने का सवाल है क्योंकि नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन और चयन की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और सख्त अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित होती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और योग्य नामांकित व्यक्ति ही संचालित करते हैं. किसी व्यक्ति या संस्था की मांग या किसी संसदीय संस्था के जुमलों से कोई फर्क नहीं पड़ता.

हां, यह जरूर होता है कि इस तरह की बेशर्मी से मांग रखने वालों का मजाक जरूर उड़ता है.  इस मांग को लेकर भी सोशल मीडिया पर व्यापक स्तर पर मजाक उड़ाया जा रहा है और कई लोगों ने तो इसे ‘शताब्दी का सबसे बड़ा मजाक’ और ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दिया है. हो सकता है पाकिस्तान इस तरीके से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहा हो लेकिन हकीकत यही है कि वह इस चक्कर में केवल मसखरी का पात्र बनकर रह गया है.

Web Title: It's hard to say whether this is a joke or a joke

विश्व से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे