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विजय दर्डा का ब्लॉग: लाखों लोगों के हत्यारे को क्या आप ढूंढ पाएंगे?

By विजय दर्डा | Updated: May 25, 2020 05:30 IST

आज सारे विश्व में तबाही मची हुई है. लोग घर से बेघर हो गए हैं. लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. बहुत से लोग भिखारी हो गए हैं लेकिन इन शक्तियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है! उनका नंगा नाच जारी है.

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आपको जो कुछ भी ऊपरी तौर पर दिखाई देता है, मामला केवल उतना ही नहीं होता है. उसके पीछे भी बहुत सारी कहानियां छिपी होती हैं, बहुत सारे षड्यंत्र मौजूद होते हैं. यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पूरी दुनिया में महाशक्तियों के बीच जारी अदृश्य जंग का खामियाजा इस दुनिया के लाखों निष्पाप लोगों को भुगतना पड़ रहा है. लोग अपनी जान देकर इस जंग की कीमत चुका रहे हैं. यह एक गंभीर सवाल है.

आज सारे विश्व में तबाही मची हुई है. लोग घर से बेघर हो गए हैं. लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. बहुत से लोग भिखारी हो गए हैं लेकिन इन शक्तियों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है! उनका नंगा नाच जारी है. क्या कोई खोज पाएगा कि इन छिपे आतंकवादियों का बसेरा कहां है? क्या कोई उन्हें ढूंढ कर सजा दे पाएगा?

महामारी के इस दौर में ये सारे सवाल सबको परेशान और पागल किए जा रहे हैं. कभी अनाज के नाम पर, कभी दवाई और कभी हथियारों के नाम पर, कभी जैविक युद्ध के नाम पर तो कभी परमाणु युद्ध के नाम पर इन महाशक्तियों ने पूरी दुनिया में नंगा नाच मचा रखा है. पैसा इनका है, दिमाग इनका है, वैज्ञानिक इनके हैं और धरती, हवा, पानी से लेकर आसमान तक इनका है. आम आदमी जाए तो कहां जाए?

इनकी करतूतों के कारण दुनिया के हर महाद्वीप में हर साल लाखों लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग मर रहे हैं या कितने बेघर हो रहे हैं! इन्हें केवल अपने हितों की चिंता है. खुद की हवस के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं. उन्हें तो बस दुनिया को अपनी मुट्ठी में नचाना है!

ये दुनिया को बेहतर बनाने का दावा करते हैं लेकिन हकीकत कुछ और होती है. वे चालाक भी हैं और चालबाज भी! बड़े शातिराना तरीके से वे लोगों के दिमाग पर राज करते हैं. वे अपनी लकीर लंबी करने के लिए दूसरों की लकीरें मिटाते भी हैं. इसके हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं. वक्त के एक दौर में हमारे देश में अनाज की कमी हो गई तो अमेरिका ने हमें लाल गेहूं दिया था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा भी था कि यह गेहूं तो हमारे जानवरों के खाने लायक भी नहीं है! आपके यहां के आदमी खाते हों तो उन्हें खिलाइए. कहते हैं कि उसी लाल गेहूं के साथ हमारे यहां गाजर घास के बीज भी मिलाकर भेज दिए गए थे. आज यह हमारे लिए सिरदर्द है. जहां फसल उगनी चाहिए वहां गाजर घास के पौधे उगे नजर आते हैं.  

बात केवल अमेरिका की नहीं है!  कभी जापान और रूस भी महाशक्ति थे और अब इस कतार में चीन आकर खड़ा हो गया है. दुनिया की हर महाशक्ति इसी तरह का खेल खेलती है. ये महाशक्तियां नए-नए किस्म के बीज बनाती हैं और न केवल विकासशील बल्कि विकसित देशों तक की सरकार पर दबाव डालकर उसे बेचती हैं. किसानों को कहा जाता है कि इस बीज से फसल अच्छी होगी.

दो-तीन साल बाद किसान को पता चलता है कि जमीन तो बंजर हो गई है. इस तरह ये शक्तियां उन देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट करने में कामयाब हो जाती हैं. इनकी हवस का कोई ओर-छोर नहीं है! अफ्रीका में इन्होंने पानी पर कब्जा कर लिया क्योंकि वहां उन्हें अपना जंगी जहाज खड़ा करना है. आसमान पर सैटेलाइट के माध्यम से इनका कब्जा है. धरती के टुकड़े को हड़पने में भी ये कभी पीछे नहीं रहते.

इतना ही नहीं ये महाशक्तियां यह भी तय करती हैं कि किस देश में कौन सा प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति होगा. तुर्की, सीरिया और इराक जैसे देश इसका उदाहरण हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रूसी हस्तक्षेप का विवाद तो आपको यादहोगा ही!  

ये शक्तियां अपनी हवस को पूरा करने के लिए दूसरे देशों को धमकाती भी हैं. कुछ दिन पहले की ही बात है जब भारत ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाई के निर्यात पर रोक लगाई तो मोदीजी को दोस्त कहने वाले ट्रम्प ने अगले ही दिन धमकी दे दी. भारत को झुकना पड़ा. दरअसल इन शक्तियों का जबर्दस्त प्रभाव है. पैसे से लेकर बिजनेस तक में इनकी बात संबंधित देशों को माननी ही पड़ती है.

दूसरे देशों को परेशान करने के लिए ये शक्तियां पड़ोसियों के साथ संबंध को अशांत बनाए रखती हैं. कभी हथियारों के बल पर तो कभी पैसे के बल पर! अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार और पैसा देकर भारत को तबाह किया तो अब चीन ने श्रीलंका और नेपाल के रास्ते यही काम शुरू किया है. कौन नहीं जानता कि भारत में सबसे ज्यादा अवैध हथियार चीन भेजता है! जिस देश में भी थोड़ा सामथ्र्य होता है उसे तबाह करने का षड्यंत्र रचती हैं ये शक्तियां. ईरान इसका उदाहरण है.

कितनी विचित्र बात है कि इराक में अमेरिका इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों को मारता है तो सीरिया में उसी इस्लामिक स्टेट की मदद करता है. यह सब इसलिए होता है क्योंकि यदि शांति हो गई तो इन शक्तियों को पूछेगा कौन? इन पर ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि दवाई कंपनियों से लाखों बिलियन लेने के ऐवज में दवाइयां पहले बन जाती हैं और बीमारियां बाद में सामने आती हैं.

ऐसी स्थिति में कोई कैसे उम्मीद करे कि कोविड-19 के फैलाव के कारणों की सही-सही जांच हो पाएगी! जांच करने वाली संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन ही इस वक्त संदेह के घेरे में है और उस पर चीन की तरफदारी के आरोप लग रहे हैं. ऐसे में दुनिया को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि लाखों लोगों के हत्यारों को पूरी ईमानदारी से ढूंढने और सजा देने की कोई कोशिश भी करेगा! 

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