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ट्रम्प का ये निजी राष्ट्रवाद सबको तबाह कर देगा

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 10, 2025 07:15 IST

हम भले ही लड़खड़ाए नहीं हैं लेकिन अमेरिका पर अब भरोसा भी नहीं रह गया है. तो सवाल पैदा होता है कि आगे क्या होगा? क्या ये ट्रेड वाॅर आर्थिक मंदी लेकर आएगा?

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अब यह पूरी तरह सुनिश्चित हो गया है कि दो-दो महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वाॅर शुरू हो चुका है. चीनी सामान पर अमेरिका ने पहले से 20 प्रतिशत टैरिफ लगाया हुआ था. ट्रम्प ने अपने निजी राष्ट्रवाद की लहर में दुनिया के 60 देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा के साथ चीन पर 34 प्रतिशत का और टैरिफ लगा दिया. चीन जिन देशों के माध्यम से अमेरिका को चकमा दे रहा था उन देशों पर भी ट्रम्प ने अनाप-शनाप टैरिफ लगा दिया.

ट्रम्प को यह लगा कि चीन इससे झुक जाएगा और अमेरिका के सामने नतमस्तक हो जाएगा लेकिन वे यह भूल गए कि चीन काफी दिनों से अमेरिका को चुनौती देने के मूड में है. और यह वक्त तो उसके लिए और भी माकूल है क्योंकि ट्रम्प ने तो अपने सभी दोस्तों के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रखी है. इस क्रम में उन्होंने खुद का पैर भी कुल्हाड़ी पर मार लिया है, लेकिन उनके कान में फुसफुसाने वालों पर उन्हें इस कदर भरोसा है कि उन्हें अपना पैर जख्मी होना दिख ही नहीं रहा है.

वे तो सीना तान कर कह रहे हैं कि टैरिफ के कारण अमेरिका में पैसों की बरसात हो रही है. अब यह उनसे कौन पूछे कि यदि अमेरिका में पैसे की बरसात हो रही है तो लाखों-लाख लोग उनके खिलाफ सड़कों पर क्यों उतर आए. क्यों पूरे अमेरिका में बेचैनी का वातावरण है? खैर, चीन ने यह भांप लिया कि इस वक्त अमेरिका जो कर रहा है, उससे वह खुद कमजोर हो सकता है और इसीलिए चीन पूरी ताकत से अमेरिका को चुनौती देने के मूड में आ गया.

उसने भी अमेरिकी सामान के आयात पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. ट्रम्प उस तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं जिसे किसी की चुनौती दुश्मनी की तरह लगती है. चीनी टैरिफ के जवाब में ट्रम्प ने 50 प्रतिशत और टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है. यानी कुल टैरिफ हो गया है 104 प्रतिशत. जवाब में चीन ने भी 50 प्रतिशत और बढ़ाकर कुल 84 प्रतिशत टैरिफ कर दिया है.

अब जरा सोचिए कि जो चीजें चीन से अमेरिका पहुंचती हैं उनकी कीमत दोगुना से भी ज्यादा हो जाएगी तो इसका असर किस पर होगा? क्या अमेरिका पर नहीं होगा? ट्रम्प को लगता है कि जो कंपनियां चीन में सामान बना रही हैं, वे टैरिफ से घबराकर अमेरिका पहुंच जाएंगी ताकि टैरिफ से बच सकें. लेकिन क्या यह संभव है? क्या ट्रम्प यह चाहते हैं कि दुनिया भर की कंपनियां उनके देश में आ जाएं और दुनिया के दूसरे देश कंगाल हो जाएं? पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर हो जाएं?

कुछ छोटे देश झुक सकते हैं लेकिन मजबूत आर्थिक शक्ति वाला देश चीन क्यों झुके? इसलिए यह तय हो गया है कि दोनों आर्थिक शक्तियों के बीच ट्रेड वाॅर को रोकना अब नामुमकिन है. स्वाभाविक सा सवाल है कि यह ट्रेड वाॅर बढ़ा तो भारत का क्या होगा? कुछ लोग कह रहे हैं कि इसे अवसर के रूप में तब्दील किया जा सकता है लेकिन हकीकत में यह इतना आसान नहीं है.

इस आर्थिक जंग में चाहे-अनचाहे सबको पिसना होगा. भारत के साथ दिक्कत यह है कि वह चीन पर भरोसा नहीं कर सकता क्योंकि हम उसकी विस्तारवादी नीतियों का खामियाजा उठाते रहे हैं. इधर अमेरिका ने भारत को दोस्ती का एहसास कराते-कराते लंगड़ी मार दी है.

हम भले ही लड़खड़ाए नहीं हैं लेकिन अमेरिका पर अब भरोसा भी नहीं रह गया है. तो सवाल पैदा होता है कि आगे क्या होगा? क्या ये ट्रेड वाॅर आर्थिक मंदी लेकर आएगा? यदि ऐसा हुआ तो पूरे विश्व के लिए यह बहुत तकलीफदेह होने वाला है. कोई तो ट्रम्प को समझाए कि कोविड की आर्थिक मंदी से उबर रहा विश्व एक और मंदी के लिए तैयार नहीं है. निजी राष्ट्रवाद की सनक बहुत महंगी पड़ने वाली है.

टॅग्स :डोनाल्ड ट्रंपअमेरिकाUSबिजनेसचीन
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