शगुफ्ता यास्मीन
इस्लाम के पांच अरकान (स्तंभ) हैं- कलमा पढ़ना, पांच वक्त की नमाज पढ़ना, रोजा रखना, जकात देना एवं हज अदा करना, जो हर मोमिन मुसलमान पर फर्ज करार दिए गए हैं. रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है. चांद देखकर रमजान के महीने की पहली तारीख से रोजे शुरू किए जाते हैं. उनतीस या तीस रोजे रखे जाते हैं. शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईद-उल-फित्र मनाई जाती है. ईद के दिन रोजा रखने की सख्त मनाही है. रमजान का महीना बरकतों का महीना है. यह खैरात (दान) करने, नेक अमल (अच्छे काम), नेकियां (पुण्य) कमाने, गरीबों और मुस्तहिकों (जरूरतमंदों) की मदद करने, दूसरों के दुःख-दर्द को समझकर उन्हें दूर कर इंसानियत की सेवा करने का सबक सिखाने वाला महीना है. इस अमल के लिए सत्तर गुना नेकियों (पुण्य) का सवाब मिलता है.
अल्लाह (ईश्वर) की राह में इस महीने में रोजा रखने वाले, इबादत करने वाले रोजेदार, नेक एवं नेकी करने वाले बंदे (भक्त) इस पवित्र बरकत वाले महीने में अपने रब (ईश्वर) के बहुत करीब होते हैं. रोजा हर मोमिन मुसलमान पर फर्ज है, केवल उन्हें छोड़कर जो बहुत बीमार है या सफर में है.
रोजा इंसान को खुद पर काबू रखना (आत्मनियंत्रण), सब्र करना (धीरज रखना), बुराइयों से दूरी और नेक अमल (अच्छे काम) करने की तौफीक (प्रेरणा) देता है. कुल मिलाकर महीने भर के रोजे मनुष्यों के लिए साल भर नेक इंसान (अच्छा मनुष्य) बने रहने की ट्रेनिंग (अभ्यास) है. जब इंसान इसे कुछ-कुछ भूलने लगता है, तब फिर माहे मुबारक रमजान आ जाता है, उन्हें नेक इंसान बनने की ट्रेनिंग देने.
हर साल इस ट्रेनिंग को पूरा कर सालभर इसपर अमल किया जाए तो दुनिया अच्छे लोगों का ठिकाना हो जाएगी. रोजा हमें सिखाता है कि दुनिया में जो भूखे-प्यासे, गरीब लोग हैं, उनकी मदद करें, जिससे वे कम से कम भूखों न मरें. इसीलिए बच्चा जब छह साल का होता है तो उसे पहला रोजा रखवाया जाता है. उसे नए कपड़े पहनाए जाते हैं.
तरह-तरह के पकवान बनाकर रिश्तेदारों - मित्रों और पड़ोसियों को आमंत्रित किया जाता है. उसे पहला रोजा रखने पर सब लोग दुआओं के साथ तोहफे देते हैं. कुल मिलाकर यह एक छोटा सा उत्सव होता है. जब बच्चा दिनभर भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस करता है तो उसे भूखे-प्यासे लोगों की तकलीफ और दर्द का एहसास होता है.
बचपन से ही इस ट्रेनिंग द्वारा उसमें भूखे-प्यासे लोगों की मदद, दान-पुण्य, खैरात, नेकी करने और अपनी इंद्रियों पर संयम रखने की आदत और जज्बा पैदा होता है. वह अपनी इंद्रियों पर काबू रखना सीख सकता है. इसी सीख से उसे एक अच्छा, सच्चा इंसान बनने की तौफीक मिलती है. बच्चे देश का भविष्य हैं. उनमें अच्छे संस्कार पिरोने से स्वस्थ समाज का निर्माण होता है.