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Guru Purnima 2022: गुरु पूर्णिमा का महत्व, क्यों मनाते हैं इसे और क्या है मान्यता, जान लीजिए सबकुछ

By योगेश कुमार गोयल | Updated: July 13, 2022 09:10 IST

हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है. इस बार ये 13 जुलाई को है. प्राचीन काल से ही गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने का चलन है.

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प्रत्येक माह आने वाली पूर्णिमा को शास्त्रों में पुण्यदायी माना गया है और आषाढ़ मास की पूर्णिमा का महत्व तो काफी ज्यादा है, जिसे ‘गुरु पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है. ग्रीष्म संक्रांति के बाद आषाढ़ मास में जुलाई अथवा अगस्त माह में आने वाली पहली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है. 

हिंदू कैलेंडर में आषाढ़ मास को चौथा मास माना गया है और इस वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा 13 जुलाई को है, इसीलिए इसी दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के पर्व से ही वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने तथा गरीबों में दान-पुण्य करने का महत्व माना गया है. 

योग साधना तथा ध्यान का अभ्यास करने के लिए गुरु पूर्णिमा को विशेष लाभ देने वाला दिन माना जाता है. गुरु पूर्णिमा का पर्व शास्त्रों में गुरुओं को समर्पित है. वैसे तो गुरु को सभी धर्मों में विशेष महत्व दिया जाता रहा है लेकिन हिंदू धर्म में तो गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है. गुरु की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा भी गया है-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः/ गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।

अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है. गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है, उन सद्गुरु को प्रणाम.

प्राचीन काल से ही गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने का चलन है. माना जाता है कि इसी दिन महाभारत के रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्म हुआ था. कृष्ण द्वैपायन को 28वां वेद व्यास माना जाता है. श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान विष्णु के जिन 24 अवतारों का वर्णन है, उनमें महर्षि वेद व्यास का भी नाम है, जो चिरंजीवी माने गए हैं. 

संस्कृत के प्रकांड विद्वान महर्षि वेद व्यास को ही प्रथम गुरु माना जाता है, जिनके सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाने लगा, जिसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है. महाभारत के अलावा आदिगुरु वेद व्यास को श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र मीमांसा तथा 18 अन्य पुराणों का भी रचयिता माना जाता है. 

धर्म ग्रंथों के अनुसार द्वापर युग के अंत और कलियुग के प्रारंभ में करीब 6500 वर्ष पूर्व आषाढ़ पूर्णिमा को कृष्ण द्वैपायन अर्थात् वेद व्यास के रूप में भगवान श्रीनारायण ने यमुना नदी के द्वीप पर अवतार लिया था, जिन्होंने 18 पुराण, एक लाख श्लोक वाला महाभारत व ब्रह्मा-सूत्र की रचना के साथ एक वेद को चार वेदों में विस्तारित कर समस्त संसार को ज्ञान से प्रकाशित किया था, इसीलिए उन्हें आदि-गुरु का दर्जा प्राप्त है.

शास्त्रों में चूंकि गुरु के पद को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है, इसीलिए गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु का विशेष पूजन करने का विधान है. पुराने समय में गुरुकुल में रहने वाले छात्र गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरुओं की विशेष पूजा-अर्चना किया करते थे. दरअसल गुरु की कृपा से ही विद्यार्थियों को विद्या की प्राप्ति होती है और उनके अंदर का अज्ञान तथा अंधकार दूर होता है.  

गुरु पूर्णिमा का पर्व वास्तव में मानव जीवन में गुरु के विशिष्ट स्थान को दर्शाता है. शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त करना कठिन है. गुरु कृपा से ही विश्व के समस्त सुखों, ऐश्वर्य और स्वर्ग की सम्पदा प्राप्त हो सकती है, जो बड़े-बड़े योगियों को भी नसीब नहीं होती. मनुस्मृति के अनुसार ऐसे व्यक्ति को ही गुरु बनाना चाहिए, जो क्षमा, दया, तपस्या, पवित्रता, यम, नियम, दान, सत्य, विद्या, संतोष इत्यादि दस गुणों से सम्पन्न हो. कबीरदास कहते हैं -

भली भई जो गुरु मिल्या, नहीं तर होती हाणि/ दीपक दिष्टि पतंग ज्यूं, पड़ता पूरी जाणि.

अर्थात अच्छा हुआ जो गुरु मिल गए, अन्यथा तो मेरी हानि ही होती. जैसे दीपक की अग्नि की ओर पतंगे आकृष्ट हो जाते हैं, वैसे ही मैं भी विषय वासनाओं और माया की ओर आकृष्ट हो जाता और परिणाम स्वरूप अमूल्य जीवन को नष्ट कर देता.

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