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ब्लॉग: नक्सल समस्या से निजात मिलने की बंधती उम्मीद

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: September 10, 2024 10:40 IST

नक्सली हिंसा से लंबे समय से ग्रस्त छत्तीसगढ़ में अब केंद्र सरकार द्वारा नक्सलियों के खात्मे के लिए निर्णायक लड़ाई की तैयारी किए जाने से उम्मीद है कि राज्य को आए दिन की हिंसा और रक्तपात से निजात मिल सकेगी.

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ठळक मुद्देछत्तीसगढ़ में माओवाद विरोधी अभियानों में मारे जाने वाले नक्सलियों की संख्या में हाल के दिनों में वृद्धि देखी गई है. इस साल सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 153 नक्सली मारे जा चुके हैं. देश में माओवादी हिंसा के कारण होने वाली मौतों की संख्या भी 2004-14 में 6,568 से घटकर 2014-24 में 1,990 रह गई. 

नक्सली हिंसा से लंबे समय से ग्रस्त छत्तीसगढ़ में अब केंद्र सरकार द्वारा नक्सलियों के खात्मे के लिए निर्णायक लड़ाई की तैयारी किए जाने से उम्मीद है कि राज्य को आए दिन की हिंसा और रक्तपात से निजात मिल सकेगी. इसके लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) राज्य के बस्तर जिले में सबसे अधिक नक्सल-हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में 4000 से अधिक कर्मियों वाली चार बटालियनों को तैनात कर रहा है. 

मार्च 2026 तक माओवादी समस्या को समाप्त करने के केंद्र सरकार के नवीनतम संकल्प के अनुरूप ‘निर्णायक लड़ाई’ शुरू करने की रणनीति का यह हिस्सा है और इस तैनाती का उद्देश्य बस्तर के सभी ‘नो-गो’ और अज्ञात क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाकर पैर जमाना है. 

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य की राजधानी रायपुर में संकेत दिए थे कि सरकार देश को वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से मुक्त करने के लिए एक ‘मजबूत और निर्मम’ कार्य योजना बनाएगी. 

छत्तीसगढ़ में माओवाद विरोधी अभियानों में मारे जाने वाले नक्सलियों की संख्या में हाल के दिनों में वृद्धि देखी गई है. इस साल सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 153 नक्सली मारे जा चुके हैं. शाह ने 24 अगस्त को रायपुर में कहा कि 2004-14 की तुलना में 2014-24 के दौरान देश में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आई है. 

शाह ने बताया कि वर्ष 2004-14 में नक्सली हिंसा की 16,274 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के दौरान अगले दशक में यह 53 प्रतिशत घटकर 7,696 रह गई. उन्होंने कहा कि इसी तरह, देश में माओवादी हिंसा के कारण होने वाली मौतों की संख्या भी 2004-14 में 6,568 से घटकर 2014-24 में 1,990 रह गई. 

जाहिर है कि राज्य में नक्सली पहले ही दबाव में हैं और सरकार की ताजा योजना के बाद उनका सफाया होने की उम्मीद बलवती हो गई है. लेकिन इसके साथ ही सरकार को यह भी देखना होगा कि नक्सली हिंसा जिन कारणों से शुरू हुई थी, उन कारणों का भी निदान हो. अशिक्षा, विकास कार्यों की उपेक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के कारण ही स्थानीय लोगों का साथ पाने में नक्सली कामयाब होते रहे हैं. 

इसलिए सरकार को इन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा ताकि नक्सलियों का एक बार खात्मा होने के बाद नक्सलवाद के दुबारा फलने-फूलने की स्थिति न बने. अशिक्षा के कारण दुर्गम क्षेत्र के निवासी अपनी समस्याओं को सरकार के सामने उठा नहीं पाते और इसी का फायदा नक्सली उठा लेते हैं. इसलिए नक्सलवाद को अगर स्थायी तौर पर खत्म करना है तो उसके पनपने के कारणों का भी निदान करना जरूरी है.

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