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सीएसआर पर सालाना खर्च 15,000 करोड़ रुपये को पार?, विशेषज्ञ बोले-स्थानीय भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 10, 2026 12:02 IST

विशेषज्ञों ने सतत विकास को लेकर बढ़ती निगरानी के बीच स्थानीय भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत बताई है।

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ठळक मुद्देसीएसआर पर सालाना खर्च 15,000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है।चुनौती संसाधनों या नीतियों की नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर स्वामित्व या जिम्मेदारी की है।टिकाऊ आजीविका पर केंद्रित सीएसआर पहल पर 850 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।

नई दिल्लीः खनन, धातु और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) की पहल तब तक दीर्घकालिक बदलाव नहीं ला पाएगी, जब तक वे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप न हों और स्थानीय समुदाय स्वयं कल्याणकारी कार्यक्रमों की जिम्मेदारी न लें। विशेषज्ञों ने सतत विकास को लेकर बढ़ती निगरानी के बीच स्थानीय भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत बताई है।

भारत इस समय इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और बुनियादी ढांचे के विकास को तेज कर रहा है। इन क्षेत्रों में सीएसआर पर सालाना खर्च 15,000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है।

खनन, धातु और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के लिए स्थिरता और सीएसआर सलाहकार पवन कौशिक ने कहा कि अनिवार्य दो प्रतिशत सीएसआर खर्च के साथ 100 प्रतिशत जवाबदेही भी जरूरी है, तभी कल्याणकारी योजनाओं का स्थायी और मापनीय असर दिखेगा। उन्होंने कहा, ‘‘आज असली चुनौती संसाधनों या नीतियों की नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर स्वामित्व या जिम्मेदारी की है।’’

कोल इंडिया की इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लि. (एसईसीएल) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हरीश दुहान ने कहा कि कि 2014 से कंपनी ने कोयला क्षेत्रों में कौशल विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और टिकाऊ आजीविका पर केंद्रित सीएसआर पहल पर 850 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।

दुहान ने कहा, ‘‘हमारा दृष्टिकोण केवल बुनियादी ढांचा निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को सशक्त बनाने, महिलाओं और युवाओं को अवसर देने तथा समुदाय की क्षमताओं को मजबूत करने पर आधारित है।’’ हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक और मौजूदा समय में एनएमडीसी के सलाहकार अरुण के शुक्ला ने कहा कि अधिकांश सीएसआर पहल स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और कौशल विकास जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं, लेकिन उनकी सफलता तभी संभव है जब समुदाय उन्हें अपनी पहल के रूप में स्वीकार करे।

कौशिक ने कहा कि खनन कंपनियां राष्ट्रीय विकास के लिए खनिज निकालती हैं, लेकिन खनिज राष्ट्रीय संपत्ति है और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों को भी विकास और समृद्धि में भागीदार बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि सीएसआर को जरूरत से ज्यादा जटिल बना दिया गया है,

जबकि समुदाय शिक्षा, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और आजीविका जैसी सरल एवं व्यावहारिक पहल से जुड़ाव महसूस करते हैं। फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज (फिमी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सीएसआर कार्यक्रमों को स्थानीय समुदायों से परामर्श करके चलाना जरूरी है। कई खनन कंपनियां अनिवार्य दो प्रतिशत से अधिक खर्च कर रही हैं।

कोल इंडिया के पूर्व प्रमुख पार्थ भट्टाचार्य ने कहा कि सीएसआर परियोजनाएं स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ-साथ स्थानीय लोगों की जरूरतों, विशेषकर पेयजल, के अनुरूप होनी चाहिए।सरकार पहले भी कोयला क्षेत्र की कंपनियों के लिए जिम्मेदार और सतत कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देने को सीएसआर ढांचा तैयार करने की जरूरत पर जोर दे चुकी है। कोयला मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव रुपिंदर बरार ने कंपनियों से सीएसआर, कल्याण और स्थिरता प्रयासों को एकीकृत करने तथा हरित क्रेडिट अर्जित करने के लिए इन पहल को बेहतर बनाने का आग्रह किया।

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