लाइव न्यूज़ :

पीयूष पांडे का ब्लॉग: कोरोना में मरने से ज्यादा मुश्किल मरने के बाद के हालात

By पीयूष पाण्डेय | Updated: April 24, 2021 15:12 IST

कोरोना संकट ने कई कठोर चुनौतियों को सामने ला दिया है. लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है. वहीं, जिनका निधन हो रहा है, उनका ठीक से अंतिम संस्कार भी संभव नहीं हो पा रहा है.

Open in App

पाश ने कहा है कि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. कुछ भावुक लोग कोरोना काल में मान रहे हैं कि सबसे खतरनाक होता है अपनों का मर जाना, क्योंकि अपनों के मरने के बाद उनके अंतिम संस्कार में लोगों के पसीने छूट रहे हैं. 

इसी कड़ी में खुद का मर जाना भी खतरनाक होता है. कई काम पेंडिंग पड़े हों और बंदा मर जाए तो मोक्ष मिलना असंभव है, और जिस फालतू दुनिया को भोगकर स्वर्ग का टिकट कटना था, वहां दोबारा लौटना पड़ेगा, इसकी कल्पना भी रूह कंपा देती है.

बहरहाल, मैं सुबह उठना चाहता था. लेकिन जिस तरह कई कोशिशों के बावजूद अनेक राजनेताओं की अंतरात्मा नहीं जाग पाती, मेरा शरीर भी उठ नहीं पाया. जिस तरह कई लोग ईमान मरा होने के बावजूद जीवित रहते हैं, मैं भी शरीर मृत होने के बावजूद जीवित था. 

मैंने देखा कि मेरे शव को कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं है. कई घंटे मेरा शव यूं ही एक कोने में ऐसे पड़ा रहा, जैसे सरकारी दफ्तरों में गरीब एक कोने में उकड़ू बैठे रहते हैं.

कई घंटे बाद दो एंबुलेंस दरवाजे पर सायरन बजाते हुए पहुंचीं. मैं ‘मोक्ष’ के लिए उत्साहित हो उठा. लेकिन ये क्या? मेरे शव के पास पहुंचकर अचानक दोनों एंबुलेंस वालों को ब्रह्मज्ञान हुआ कि मेरा घर उनके इलाके में नहीं आता. मैं उन्हें समझाना चाहता था कि जैसे सबै भूमि गोपाल की, वैसे सबै जमीन लाश की. कहीं गाड़ देना, कहीं जला देना, मगर यहां से ले चलो भाई. लेकिन, नहीं. 

मैं अपने पुत्र को श्रवण कुमार नहीं बना सका था, लेकिन सीट बेल्ट न बांधने अथवा हेलमेट न पहनने के जुर्म में पकड़े जाने के वक्त एक-दो मौकों पर मैंने उसे व्यावहारिक ट्रेनिंग दी थी. संभवत: जब उसे शव की दुर्गंध महसूस हुई तो उसने 200 के बीस नोट निकालकर एक एंबुलेंस वाले के हाथों में धर दिए. 

इस ऐतिहासिक मौद्रिक परिघटना के बाद अचानक मेरे निवास की भौगोलिक स्थिति में बदलाव आया और शव बोरे में भरे सीमेंट की तरह एंबुलेंस में पटक दिया गया.

मुहल्ले के कई मित्र ‘अभी पहुंचते हैं’ का राग अलापकर कट लिए. दाह संस्कार में चार लोगों का कोरम पूरा नहीं हो पा रहा था. बमुश्किल तीन कंधों पर शव यात्रा शुरू हुई कि अचानक पुत्र का पांव एक गड्ढे में पड़ा और मैं शव समेत पास की नाली में गिर पड़ा. 

गिरने का लाभ यह हुआ कि नींद खुल गई. मैं समझ गया था कि कोरोना काल में मरना भी एफोर्ड नहीं किया जा सकता. आप भी चुपचाप घर में रहिए क्योंकि इस वक्त से मरने से ज्यादा मुश्किल मरने के बाद के हालात हैं.

टॅग्स :कोरोना वायरसकोविड-19 इंडिया
Open in App

संबंधित खबरें

स्वास्थ्यकौन हैं डॉ. आरती किनिकर?, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में खास उपलब्धि के लिए लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर 2026 पुरस्कार

स्वास्थ्यLMOTY 2026: हजारों मरीजों के लिए आशा की किरण?, डॉ. गौतम भंसाली को 'लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर 2026' पुरस्कार

स्वास्थ्यCOVID-19 infection: रक्त वाहिकाओं 5 साल तक बूढ़ी हो सकती हैं?, रिसर्च में खुलासा, 16 देशों के 2400 लोगों पर अध्ययन

भारत'बादल बम' के बाद अब 'वाटर बम': लेह में बादल फटने से लेकर कोविड वायरस तक चीन पर शंका, अब ब्रह्मपुत्र पर बांध क्या नया हथियार?

स्वास्थ्यसीएम सिद्धरमैया बोले-हृदयाघात से मौतें कोविड टीकाकरण, कर्नाटक विशेषज्ञ पैनल ने कहा-कोई संबंध नहीं, बकवास बात

भारत अधिक खबरें

भारतशिवसेना विवाद: हम तारीख तय करेंगे, पहले आप अपने लोगों को मीडिया में जाने और गैर-जिम्मेदाराना बयान देने से रोकें, सुप्रीम कोर्ट सख्त, एकनाथ शिंदे-उद्धव ठाकरे गुट से नाराज?

भारतमप्र उच्च न्यायालय ने धार स्थित भोजशाला को मंदिर घोषित किया, हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार भी दिया?

भारतपटना के गुलजारबाग में स्थापित की जायेगी 108 फीट ऊंची भगवान महावीर की प्रतिमा

भारतपश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से इस्तीफा दिया, भवानीपुर बरकरार रखा

भारतपुलगांव केंद्रीय आयुध डिपो में फायरिंग अभ्यास के दौरान हादसा, सूबेदार मेजर की मौत