पटना के गुलजारबाग में स्थापित की जायेगी 108 फीट ऊंची भगवान महावीर की प्रतिमा

By एस पी सिन्हा | Updated: May 15, 2026 15:11 IST2026-05-15T15:11:03+5:302026-05-15T15:11:45+5:30

विशाल जैन तीर्थ केंद्र (पावापुरी के बाद) के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां संगमरमर का भव्य परिसर बनेगा.

patna 108-feet tall statue Lord Mahavir installed in Gulzarbagh Bihar statue included major religious attractions not only in Bihar entire country | पटना के गुलजारबाग में स्थापित की जायेगी 108 फीट ऊंची भगवान महावीर की प्रतिमा

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Highlightsश्री स्थूलिभद्र श्रेष्ठी सुदर्शन जैन श्वेतांबर मणि लक्ष्मी तीर्थ नाम से विकसित की जा रही है.जटिल नक्काशी और बड़े पैमाने पर धार्मिक वास्तुकला देखने को मिलेगी. जीवन त्याग, संयम और आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण माना जाता है.

पटनाः बिहार की राजधानी पटना के गुलजारबाग स्टेशन के पास स्थित कमलादा जी क्षेत्र में एक विशाल जैन तीर्थस्थल और सांस्कृतिक परिसर का निर्माण कार्य प्रगति पर है. यहां 108 फीट ऊंची भगवान महावीर की प्रतिमा स्थापित की जायेगी. यह प्रतिमा पूरे बिहार ही नहीं बल्कि देश प्रमुख धार्मिक आकर्षणों में शामिल होने की क्षमता रखती है. ऐसे में इसके पूरा हो जाने पर, यह परिसर धार्मिक पर्यटन के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरने की उम्मीद है, जो भारत और विदेशों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगा. यह परियोजना श्री स्थूलिभद्र श्रेष्ठी सुदर्शन जैन श्वेतांबर मणि लक्ष्मी तीर्थ नाम से विकसित की जा रही है.

जीर्णोद्धार और विकास कार्य की देखरेख दिनेश भाई शाह कर रहे हैं. यह स्थान आचार्य स्थूलिभद्र स्वामी और श्रेष्ठी सुदर्शन की भूमि रही है, जो चंद्रगुप्त मौर्य काल से ही आस्था का बड़ा केंद्र है. इस स्थान को एक विशाल जैन तीर्थ केंद्र (पावापुरी के बाद) के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां संगमरमर का भव्य परिसर बनेगा.

यह परियोजना जैन अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल और एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में काम करेगी. उल्लेखनीय है कि लगभग 100,000 वर्ग फुट में फैला यह मंदिर परिसर मुख्य रूप से सफेद संगमरमर से बनाया जा रहा है और इसमें जटिल नक्काशी और बड़े पैमाने पर धार्मिक वास्तुकला देखने को मिलेगी.

यह वही पुण्यभूमि है जहां जैन धर्म के महान आचार्य श्री स्थूलीभद्र स्वामी की साधना स्थली और श्रेष्ठी सुदर्शन स्वामी का अलौकिक स्थान स्थित है. जैन श्वेतांबर समाज के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं माना जाता. जैन धर्म में श्रेष्ठी सुदर्शन की कथा सदाचार, सत्य और चरित्र की प्रेरणा देने वाली मानी जाती है.

कहा जाता है कि जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, तब उन्होंने नवकार महामंत्र का स्मरण किया और सूली सिंहासन में परिवर्तित हो गई. यह घटना आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था और चमत्कार का प्रतीक बनी हुई है. भगवान महावीर की आयु 72 वर्ष होने के कारण प्रतिमा की ऊंचाई भी 72 फीट निर्धारित की गई है.

यह प्रतिमा 36 फीट ऊंचे कमल पर स्थापित होगी, जिससे इसकी कुल ऊंचाई 108 फीट हो जाएगी. बताया जाता है कि तीर्थ परिसर को केवल पूजा स्थल तक सीमित नहीं रखा जाएगा बल्कि इसे संपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. परिसर में जैन जगत, तीर्थंकरों, आचार्य स्थूलीभद्र स्वामी और श्रेष्ठी सुदर्शन स्वामी के जीवन पर आधारित चित्रशाला भी बनाई जाएगी.

यहां आने वाले लोग केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि जैन इतिहास और संस्कृति को भी करीब से जान सकेंगे. आचार्य श्री स्थूलिभद्र स्वामी जैन धर्म के एक महान आचार्य, विद्वान और तपस्वी मुनि थे. उन्होंने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार तथा आगम ग्रंथों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनका जीवन त्याग, संयम और आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण माना जाता है.

स्थूलीभद्र स्वामी का जन्म लगभग 297 ईसा पूर्व में हुआ था और वे जैन धर्म के श्वेतांबर परंपरा के प्रमुख आचार्यों में गिने जाते हैं. आचार्य स्थूलिभद्र का जन्म मगध क्षेत्र में हुआ था. उनके पिता शकटाल (शक्ताल) राजा धनानंद के मंत्री थे. बचपन से ही स्थूलिभद्र अत्यंत बुद्धिमान, सुन्दर और प्रतिभाशाली थे.

युवावस्था में वे पाटलिपुत्र की प्रसिद्ध नर्तकी रूपकोशा के प्रेम में पड़ गए और सांसारिक जीवन में लिप्त हो गए. कुछ समय बाद उन्हें यह अनुभव हुआ कि सांसारिक सुख क्षणिक होते हैं और जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण है. तब उन्होंने सब कुछ त्याग कर जैन साधु बनने का निश्चय किया. वे जैन आचार्य संभूतविजय के शिष्य बने और कठोर तप, अध्ययन तथा साधना में लग गए.

आचार्य स्थूलीभद्र स्वामी को श्वेतांबर जैन परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण विद्वानों और तपस्वियों में से एक माना जाता है. ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार उनका जन्म लगभग 297 ईसा पूर्व मगध क्षेत्र में हुआ था. ऐसा माना जाता है कि उनके पिता, शक्तल, राजा धनानंद के दरबार में मंत्री के रूप में कार्यरत थे.

जैन परंपराओं के अनुसार, स्थूलिभद्र युवावस्था में असाधारण रूप से प्रतिभाशाली थे, जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग करके आध्यात्मिक अनुशासन और आत्म-साक्षात्कार की राह पकड़ी. एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार वर्षावास (चातुर्मास) के समय उन्होंने उसी नर्तकी रूपकोशा के घर में रहकर तपस्या की.

रूपकोशा ने उन्हें फिर से सांसारिक जीवन की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया, परंतु स्थूलिभद्र स्वामी अपने संयम से विचलित नहीं हुए. अंततः उनकी आध्यात्मिक शक्ति से प्रभावित होकर रूपकोशा ने भी जैन धर्म की श्राविका व्रत धारण कर लिया. एक समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यापारी थे. उनके पास धन-दौलत, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी.

लेकिन इतने वैभव के बावजूद उनका जीवन अत्यंत सादा और धार्मिक था. वे नियमित रूप से जैन धर्म के सिद्धांतों अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और संयम का पालन करते थे. करीब 5.04 एकड़ क्षेत्रफल वाली इस ऐतिहासिक भूमि की देखरेख वर्षों से पटना ग्रुप ऑफ जैन श्वेतांबर टेंपल्स कमिटी द्वारा की जा रही है. कला एवं संस्कृति विभाग तथा पुरातत्व विभाग में भी इस भूमि का उल्लेख दर्ज है.

Web Title: patna 108-feet tall statue Lord Mahavir installed in Gulzarbagh Bihar statue included major religious attractions not only in Bihar entire country

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