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कोविड ही नहीं और भी कारण हैं नाराजगी के, अभय कुमार दुबे का ब्लॉग

By अभय कुमार दुबे | Updated: June 1, 2021 14:49 IST

आंकड़े साफ तौर से कह रहे हैं कि सरकार से नाराज लोगों की संख्या और मोदी सरकार से नाराज लोगों की संख्या भाजपा और उसके रणनीतिकारों को असहज करने के लिए काफी है.

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ठळक मुद्दे सर्वेक्षण, बताता है कि 2019 में मोदी सरकार से संतुष्ट लोगों की संख्या 75 फीसदी थी.देश में मोदी सरकार से नाराजगी का सबसे बड़ा स्नोत अगर प्रतिशत में निकाला जाए तो कोविड महामारी प्रबंधन में मिली विफलता है.शहर के नौ और गांव के नौ फीसदी लोग नागरिकता कानून को अपनी नाराजगी की वजह बताते हैं.

राष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण में एक न्यूज चैनल ने दो दिन तक जारी प्रसारण में बताया है कि चुने जाने के दो साल बाद मोदी सरकार से 31 फीसदी लोग पूरी तरह से खुश हैं, 37 फीसदी लोग बेहद असंतुष्ट हैं और 28 फीसदी लोग एक सीमा तक ही संतुष्ट हैं.

सरकार  के नेतृत्व के बारे में जब सवाल पूछा गया तो 37 फीसदी लोग संतुष्ट, 36 फीसदी असंतुष्ट और 25 फीसदी एक सीमा तक संतुष्ट निकले. ध्यान रहे कि भाजपा ने 2014 में 31 फीसदी और 2019 में 38 फीसदी वोट पाकर चुनाव जीता था. यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि 28 और 25 फीसदी का आंशिक रूप से संतुष्ट वाला आंकड़ा न तो संतुष्टों के साथ जोड़ा जा सकता है, और न ही असंतुष्टों के साथ.

वजह सीधी है. जो आंशिक रूप से संतुष्ट हैं, स्वाभाविक तौर पर वह आंशिक रूप से असंतुष्ट भी होगा. यह एक अलग श्रेणी है. अगर इसे संतुष्टों या असंतुष्टों से जोड़ा गया तो या तो मोदी सरकार के पक्ष में सर्वेक्षण झुक जाएगा या विपक्ष में. ऐसा करना विेषण की ईमानदारी के लिहाज से उचित नहीं होगा. दरअसल, ऐसे आंकड़े सात साल में  पहली बार सामने आए हैं.

इससे  पहले जब भी सर्वेक्षण होता था, मोदी की सरकार को मोटे तौर पर साठ फीसदी के आसपास या उससे ज्यादा रेटिंग मिलती ही थी. ये आंकड़े साफ तौर से कह रहे हैं कि सरकार से नाराज लोगों की संख्या और मोदी सरकार से नाराज लोगों की संख्या भाजपा और उसके रणनीतिकारों को असहज करने के लिए काफी है.

एक दूसरा सर्वेक्षण, बताता है कि 2019 में मोदी सरकार से संतुष्ट लोगों की संख्या 75 फीसदी थी. 2020 में यह घटकर 62 फीसदी रह गई. अब 2021 में यह और नीचे चली गई है यानी इस वक्त मोदी सरकार की रेटिंग केवल 51 फीसदी ही है. इसका सीधा मतलब है कि पिछले दो साल में मोदी सरकार की रेटिंग में जबरदस्त 24 फीसदी गिरावट आई है.

इन सर्वेक्षणों के कुछ और पहलू उल्लेखनीय हैं. देश में मोदी सरकार से नाराजगी का सबसे बड़ा स्नोत अगर प्रतिशत में निकाला जाए तो कोविड महामारी प्रबंधन में मिली विफलता है. शहर के 44 और गांव के 40 फीसदी लोग मानते हैं कि मोदी सरकार से उनकी नाराजगी की सबसे बड़ी वजह यही है. शहर के 20 और गांव के 25 फीसदी लोग मानते हैं कि वे तीन कृषि कानूनों के कारण सरकार से क्षुब्ध हैं.

शहर के नौ और गांव के नौ फीसदी लोग नागरिकता कानून को अपनी नाराजगी की वजह बताते हैं. इसी तरह शहर के सात और गांव के दस फीसदी लोगों को लगता है कि चीन से सीमा विवाद में सरकार की नाकामी उनकी नाराजगी का मुख्य कारण है. इन आंकड़ों से मोदी सरकार के प्रति जनता के क्षोभ की संरचना का पता लगता है.

सबसे ऊपर महामारी है, फिर किसान आंदोलन है, फिर सीएए है और फिर विदेश नीति का नंबर आता है. इससे यह भी जानकारी मिलती है कि गांव और शहर के लोग कितने ध्यान से मोदी सरकार का कार्य-व्यापार देख रहे हैं. मसलन, गृह मंत्री अमित शाह, जो मोदी के विश्वासपात्र और सरकार में नंबर दो माने जाते हैं, के कामकाज से केवल 28 फीसदी लोग ही संतुष्ट हैं.

37 फीसदी लोग अमित शाह के कामकाज से असंतुष्ट हैं. राज्यों के पाले में गेंद होने के बावजूद स्थिति यह है कि जनता महामारी से निपटने में विफलता का दोष केंद्र सरकार पर ज्यादा डालती है. वह यह भी मानती है कि महामारी के बावजूद प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी रैलियां करना गलत था.

वह यह भी मानती है कि महामारी के कारण चुनावों को स्थगित करना चाहिए था और कुंभ को केवल प्रतीकात्मक ही रखने का फैसला करना चाहिए था. सरकार की समस्या केवल यह नहीं है कि लोग नाखुश हैं, बल्कि उससे बड़ी समस्या यह है कि लोग सरकार से, व्यवस्था से, तंत्र से अब कोई उम्मीद नहीं रखते. जब पूछा गया कि लोगों के पास कितने दिन का खाना-पानी है, तो जो जवाब मिला वह भविष्य के अंदेशों से भरा हुआ था. 15.7 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके पास हफ्ते भर से भी कम का राशन है.

53 फीसदी लोगों ने बताया कि उनका राशन ज्यादा से ज्यादा तीन हफ्ते में खर्च हो जाएगा. 46 फीसदी लोगों का कहना था उनके पास जितना राशन है, वह तीन हफ्ते से कुछ ही ज्यादा चलेगा. जब लोगों से उनके भविष्य का आकलन पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें तो अपना भविष्य अंधकारमय लगता है. कहना न होगा कि जो सरकार लोगों में उम्मीद का दिया भी बुझा देती है उसकी वापसी पर सवालिया निशान लग जाता है.

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