समूचे देश में अप्रैल महीने में ही सूरज आग बरसा रहा है. भारत में बढ़ती तपिश और जानलेवा होती लू के पीछे छिपे जलवायु परिवर्तन के गहरे संकट को अल नीनो के रुख ने और घातक कर दिया है. मौसम विज्ञान के नवीनतम आंकड़े भविष्य की जिस भयावहता को रेखांकित कर रहे हैं उसकी बानगी अप्रैल के दूसरे हफ्ते से देखने को मिल गई, जिस दौरान देश के बड़े हिस्से में सूरज की तपिश ने मई-जून जैसी स्थिति पैदा कर दी. दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में भारतीय शहरों का दबदबा एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी है.
यह महज एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि वायुमंडल में बनते ‘हीट डोम’ और कांक्रीट के फैलते जंगलों का नतीजा है, जिसने शहरों को ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में तब्दील कर दिया है. जहां ग्रामीण इलाके रात में ठंडे हो जाते हैं, वहीं शहरों में रात का तापमान सामान्य से काफी ऊपर बना रहता है, जिससे मानव शरीर को पिछले दिन की गर्मी से उबरने का समय नहीं मिल पा रहा.
स्काईमेट वेदर की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट इस स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाती है, जिसके अनुसार इस साल भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून ‘सामान्य से कम’ रहने का अनुमान है. आंकड़े बताते हैं कि यह दीर्घावधि औसत ( एलपीए) का लगभग 94 प्रतिशत तक सिमट सकता है.
सबसे भयावह तथ्य यह है कि अल नीनो, जो वर्तमान में अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, मानसून के शुरुआती दौर में विकसित होकर अगस्त और सितंबर के दौरान और अधिक मजबूत होगा. हालांकि जून में मानसून की शुरुआत 101 प्रतिशत एलपीए के साथ सामान्य रह सकती है, लेकिन जुलाई (95 प्रतिशत) से स्थिति बिगड़नी शुरू होगी.
इसका सबसे अधिक खतरा मध्य भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों और उत्तर-पश्चिम भारत के राज्यों, जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान पर मंडरा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी की इस बढ़ती आवृत्ति का सीधा संबंध वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि से है. 1981 से 2020 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग एक डिग्री बढ़ चुका है.
ध्यान देना होगा कि भारत में शहरीकरण बढ़ रहा है. पहले लू का प्रभाव केवल गंगा के मैदानी इलाकों तक सीमित था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़कर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया है. शहर यानी पक्की सड़कें, आलीशान भवन और कांक्रीट की सड़कें प्राकृतिक मिट्टी की तुलना में कई गुना अधिक गर्मी अवशोषित करती हैं. रात के समय जब ग्रामीण इलाके ठंडे होने लगते हैं, शहर की ये इमारतें अपनी जमा की हुई गर्मी को छोड़ती रहती हैं. इसे ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ कहा जाता है, जिसके कारण शहरों का तापमान आसपास के गांवों से 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक बना रहता है.