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केतन गोरानिया का ब्लॉग: आत्मनिर्भरता को हां, संरक्षणवाद को ना

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 23, 2020 08:34 IST

विश्व का प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के लिए हमें संरक्षणवाद और आयात शुल्क की बात छोड़कर ज्यादा मेहनत पर ध्यान देना होगा. भूमि कानून, इंफ्रास्ट्रक्चर, फैक्टरी कानून, कार्यक्षमता को बेहतर बनाना होगा. कामयाबी के लिए इक्विटी कैपिटल को आकर्षित करना होगा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आत्मनिर्भर भारत की बात की है जो हमारे देश के लिए बेहद जरूरी है. लेकिन हमें आत्मनिर्भरता और संरक्षणवाद के बीच के अंतर को समझना होगा. हमें आत्मनिर्भर होने के दौरान संरक्षणवाद के जाल में उलझकर भटकने से बचना होगा. हम भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को जरूर 10 प्रतिशत या उससे ज्यादा संरक्षण प्रदान कर सकते हैं, लेकिन ग्लोबल टेंडर को रद्द करने जैसे कदमों से हमारे सिस्टम की अक्षमता में इजाफा होगा. यह भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी की भी वजह बन सकता है.

हालिया दिनों में सोशल मीडिया पर स्वदेशी को अपनाने और विदेशी माल के बहिष्कार के संदेशों का सैलाब आया हुआ है. आखिर हमारी स्वदेशी की कल्पना क्या है? फ्लिपकार्ट की ज्यादातर हिस्सेदारी वालमार्ट के पास है. जोमेटो में एंट फाइनेंशियल  की भागीदारी है. बिग बास्केट, बायजूस, डेल्हिवेरी, हाइक, मेक माय ट्रिप, ओला, पेटीएम, पॉलिसी बाजार, स्विगी, उड़ान में भी चीनी हिस्सेदारी है.

हिंदुस्तान यूनिलीवर में यूनिलीवर डच कंपनी की हिस्सेदारी है. फाइजर जैसी अनेक दवा कंपनियां मल्टीनेशनल हैं. फाइजर जैसी कंपनियां तो हर साल रिसर्च पर 8.65 अरब डॉलर खर्च करती हैं. क्या हम संरक्षणवाद के फेर में विदेशी उत्पादों का बहिष्कार करके अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार लेंगे?

2018 में विश्व व्यापार 19.67 ट्रिलियन डॉलर का था. यूरोपियन यूनियन (मानव संसाधन की ज्यादा लागत के साथ) ने 2018 में 328 अरब डॉलर की आईसीटी सेवाएं लीं. भारत ने अन्य सेवाओं के साथ 137 अरब डॉलर का निर्यात किया. यह हमारा मजबूत क्षेत्र है जिसमें हम नंबर एक बन सकते हैं. यूरोपियन यूनियन (5.09 ट्रिलियन डॉलर), चीन (2.32 ट्रिलियन डॉलर) और अमेरिका (1.18 ट्रिलियन डॉलर) दुनिया के तीन शीर्ष निर्यातक हैं.

विश्व का प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के लिए हमें संरक्षणवाद और आयात शुल्क की बात छोड़कर ज्यादा मेहनत पर ध्यान देना होगा. भूमि कानून, इंफ्रास्ट्रक्चर, फैक्टरी कानून, कार्यक्षमता को बेहतर बनाना होगा. कामयाबी के लिए इक्विटी कैपिटल को आकर्षित करना होगा.

आज दुनिया के कारोबार का ताना-बाना बहुत जटिल है. उदाहरण के लिए एप्पल के हर आईफोन एक्स की बिक्री पर सैमसंग को 110 डॉलर की कमाई होती है. ऐसे में जब हम बहिष्कार की बात करते हैं तो प्रत्यक्ष तौर पर जाहिर नहीं होता कि हम किसका बहिष्कार कर रहे हैं. 1991 से पहले की तुलना में सोचिए आज हर क्षेत्र में सामान की कितनी विविधता है. यह खुली अर्थव्यवस्था के कारण ही संभव हो सका है, संरक्षणवाद से नहीं. दूसरे देशों के भी संरक्षणवाद पर उतारू होने पर हमें आईसीटी और सॉफ्टवेयर जैसे महारत वाले क्षेत्रों में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. प्रतिस्पर्धा की कमी कुछ कंपनियों की मोनोपॉली की वजह बनेंगी और ऐसा हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान में उपभोक्ता रहेगा.

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