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बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाने की जल्दबाजी ठीक नहीं, जानें इसके खतरे

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 24, 2023 15:58 IST

हमारे यहां अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की स्कूलिंग पांच साल का होने से पहले ही शुरू करवा देते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं है। सारे शिक्षा मनोवैज्ञानिक और तमाम शोध भी यही कहते हैं कि बच्चों को जल्दी स्कूल भेजने से उनके व्यवहार पर दुष्प्रभाव होता है।

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नई शिक्षा नीति के तहत सरकार कई स्तर पर बदलाव ला रही है। इसी कड़ी में शिक्षा मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि पहली क्लास में बच्चों के प्रवेश की न्यूनतम उम्र 6 साल होनी चाहिए। अभी ये अलग-अलग राज्यों में 5, साढ़े 5 और 6 साल है। यह सराहनीय कदम है। इन दिनों हमारे देश में प्ले स्कूल और प्रेपरेटरी स्कूल का चलन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि अभिभावक भी इन सबके झांसे में आकर बच्चे को उम्र से पहले स्कूल भेजना शुरू कर देते हैं। 

हमारे यहां अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की स्कूलिंग पांच साल का होने से पहले ही शुरू करवा देते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं है। सारे शिक्षा मनोवैज्ञानिक और तमाम शोध भी यही कहते हैं कि बच्चों को जल्दी स्कूल भेजने से उनके व्यवहार पर दुष्प्रभाव होता है। बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र जितनी ज्यादा होगी, बच्चे का खुद पर उतना ही ज्यादा आत्मनियंत्रण होगा। 

साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि आत्मनियंत्रण एक ऐसा गुण है, जिसे बच्चों के शुरुआती समय में ही विकसित किया जा सकता है। जिन बच्चों में सेल्फ कंट्रोल होता है, वे फोकस के साथ आसानी से किसी भी परेशानी या चुनौती का सामना कर पाते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक शोध में बताया गया है कि बच्चों को पांच साल की उम्र के बजाय 6 या 7 साल की उम्र में स्कूल भेजना चाहिए। अगर बच्चे की उम्र अधिक है तो चीजों को सीखने और समझने का उसका संज्ञानात्मक कौशल बेहतर होता है। अक्षरों और संख्याओं को पहचानने, पढ़ने और याद रखने की क्षमता तेज होती है। 

दुनिया के देशों की बात करें तो इंग्लैंड में फॉर्मल स्कूलिंग शुरू करने की न्यूनतम उम्र 5 साल है जबकि अमेरिका में 6 साल। भारतीय दर्शन भी यही मानता आया है। हमारे यहां प्राचीन काल से विद्या आरंभ करने की अर्थात् औपचारिक शिक्षा प्रारंभ करने की आयु 7 वर्ष मानी गई है। फिर इतनी जल्दी क्यों? बहुत जल्दी है तो 4 वर्ष की आयु में बालवाड़ी या किंडरगार्टन में प्रवेश दिला सकते हैं। इससे कम आयु में बच्चों को स्कूल भेजने वाले अभिभावक नि:संदेह उन बच्चों के दुश्मन ही हैं, जो अज्ञानतावश, अहंकारवश या होड़ में फंसकर अपने बच्चों का बचपन तो खराब कर ही रहे हैं, उनका भविष्य भी खराब कर रहे हैं। 

स्कूल में जाने पर बच्चे को नए अनुभवों, शारीरिक, सामाजिक, व्यावहारिक और शैक्षणिक चुनौतियों और अपेक्षाओं में सामंजस्य बिठाना होता है और इनका सामना करना होता है। इसलिए अगर बच्चा इनके लिए तैयार नहीं है और उसे इनका सामना करना पड़े तो इसका नकारात्मक असर बच्चों पर पड़ता है। उसे स्कूल और पढ़ाई से चिढ़ हो सकती है। वह तनाव में भी आ सकता है और उसे अवसाद घेर सकता है। चार-पांच वर्ष तक बच्चे को घर में ही खेल-खेल में सीखने दीजिए। उसका शारीरिक और मानसिक विकास होने दीजिए। ऐसा होने के बाद दुनिया की सारी शिक्षा ग्रहण करने में उसे बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा।

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