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बच्चों को इंटरनेट के शिकारियों से बचाना जरूरी

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 21, 2023 16:42 IST

इस अध्ययन में शामिल अभिभावकों के अनुसार, ऑनलाइन दुर्व्यवहार का शिकार बने बच्चों में से 14-18 आयु वर्ग की 40 प्रतिशत लड़कियां थीं, जबकि इसी आयु वर्ग के 33 प्रतिशत लड़के थे।

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ठळक मुद्देक्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) और पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (सीएनएलयू) ने यह अध्ययन संयुक्त रूप से कियाअध्ययन पाया गया- ऑनलाइन दुर्व्यवहार का शिकार बने बच्चों में से 14-18 आयु वर्ग की 40 प्रतिशत लड़कियांअध्ययन में 4 राज्यों के 424 अभिभावकों, 384 शिक्षकों और 107 अन्य धारकों ने हिस्सा लिया

ऑनलाइन मंचों पर अजनबियों द्वारा बच्चों को फंसाने के लिए जाल बिछाने का पता लगाने के लिए किए अध्ययन के निष्कर्ष बेहद चिंताजनक हैं, क्योंकि उससे पता चल रहा है कि इंटरनेट पर मासूम बच्चों के अजनबियों के जाल में फंसने का खतरा कितना बड़ा है। क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) और पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (सीएनएलयू) ने यह अध्ययन संयुक्त रूप से किया, जिसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश के 424 अभिभावकों के अलावा, इन चार राज्यों के 384 शिक्षकों और तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के 107 अन्य हितधारकों ने हिस्सा लिया।

33.2 प्रतिशत अभिभावकों ने बताया कि ऑनलाइन मंचों पर उनके बच्चों से अजनबियों ने दोस्ती करने, निजी व पारिवारिक जानकारी मांगने और रिश्तों को लेकर यौन संबंधी परामर्श देने के लिए संपर्क किया। इस अध्ययन में शामिल अभिभावकों के अनुसार, ऑनलाइन दुर्व्यवहार का शिकार बने बच्चों में से 14-18 आयु वर्ग की 40 प्रतिशत लड़कियां थीं, जबकि इसी आयु वर्ग के 33 प्रतिशत लड़के थे।

अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे ऑनलाइन बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार का शिकार अधिक हो रहे हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि शहरों के मुकाबले गांव-देहातों में ऑनलाइन दुर्व्यवहार से बचने या उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने को लेकर जागरूकता कम है, लेकिन अध्ययन में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली जो बात सामने आई, वह यह है कि अभिभावकों से जब पूछा गया कि उनके बच्चों के साथ अगर ऑनलाइन बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार हुआ तो वे क्या करेंगे, तो 70 प्रतिशत अभिभावकों ने थाने जाकर शिकायत दर्ज कराने के विकल्प को खारिज कर दिया, केवल 30 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि वे शिकायत दर्ज कराएंगे।

16 प्रतिशत अभिभावकों को तो इस बारे में कोई कानून होने की भी जानकारी नहीं थी। निश्चित रूप से यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। इंटरनेट आज बड़ों ही नहीं, बच्चों के जीवन का भी एक तरह से अपरिहार्य अंग बन चुका है। छात्रों को उसमें अपनी अध्ययन सामग्री आसानी से हासिल हो जाती है और कई बार तो उन्हें इसके बिना अपने स्कूल के प्रोजेक्ट्स पूरे करना संभव ही नहीं हो पाता।

अगर सदुपयोग किया जाए तो इंटरनेट वरदान के समान है लेकिन दुरुपयोग करने वाले कुछ लोग खासकर बच्चों के लिए इसे अभिशाप बनाकर रख देते हैं। इससे बचने का तरीका यही है कि अभिभावक अपने घर का वातावरण ऐसा रखें कि बच्चे इससे संबंधित कोई भी बात बिना किसी झिझक के उन्हें बता सकें। अगर अजनबियों के बहकावे में आकर बच्चों से कोई गलती भी हो जाए तो वे बच्चों पर गुस्सा न हों बल्कि पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं। 

बच्चों को ऑनलाइन बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार से बचाने से संबंधित कानूनों के बारे में जनजागृति फैलाया जाना भी बेहद जरूरी है ताकि संबंधित अभिभावकों को इस बारे में तुरंत मदद मिल सके। ऑनलाइन भी अगर बच्चों का यौन शोषण या दुर्व्यवहार हो तो इसकी बुरी स्मृतियों से वे जीवनभर उबर नहीं पाते, इसलिए जरूरी है कि बच्चों को ऑनलाइन उत्पीड़न से बचाने और उनको शिकार बनाने की कोशिश करने वालों को सजा दिलाने की हरसंभव कोशिश की जाए। 

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