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अभिलाष खांडेकर का ब्लॉग: बलात्कार-मुक्त कैसे बने भारत देश?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: August 23, 2024 08:46 IST

बढ़ते बलात्कार सभी सरकारों पर सबसे बड़ा दाग हैं. असम, मध्यप्रदेश और अब महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लाडली बहना जैसी योजनाएं शुरू करने और हर महीने मुफ्त में पैसे बांटने के बजाय, मुख्यमंत्रियों को महिलाओं की सुरक्षा पर करदाताओं का पैसा खर्च करना चाहिए. 

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ठळक मुद्देकोलकाता और बदलापुर की घटनाएं दिखाती हैं कि इस तरह के अपराध की घटनाओं में कोई भी कमी नहीं आई है. क्या भारत के वैभवशाली इतिहास में कभी भी लड़के और पुरुष इतने वहशी रहे हैं?मध्यप्रदेश सरकार ने 2017 में नाबालिग लड़कियों के बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड का कानून बनाया था.

जब मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ एक डॉक्टर के साथ बलात्कार के बाद हुई भयावह घटनाओं की सुनवाई कर रही थी और कह रही थी कि 'हम एक और बलात्कार का इंतजार नहीं कर सकते', उसी समय महाराष्ट्र के बदलापुर के एक स्कूल में चार साल की दो बच्चियों के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया गया, जिससे नए सिरे से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.

कोलकाता के वीभत्स बलात्कार कांड को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन अभी भी थमा नहीं है, लेकिन यह जघन्य अपराध देश भर में बेरोकटोक जारी है. हमारी सामूहिक अंतरात्मा शायद बेसुध हो चुकी है. चिकित्सकों की बिरादरी ने आरजी कर अस्पताल की उस घटना के खिलाफ खड़े होकर पूरी एकजुटता दिखाई, लेकिन बलात्कार की ऐसी अनगिनत रोजाना घटनाएं होती हैं, जिनके खिलाफ कोई खड़ा नहीं होता. 

वैश्विक स्तर पर भारत को अपमानजनक रूप से 'बलात्कार की राजधानी' के रूप में जाना जाता है. इस पहचान के साथ हम कैसे जी सकते हैं? क्या यह घृणित पहचान हमारे राजनेताओं को प्रभावित करती है? उनकी नींद उड़ाती है? मोमबत्ती जुलूस और हड़ताल लंबे समय तक नहीं चलते हैं; हमने यह 2012-13 में दिल्ली में देखा था. 

इस तरह के अपराध को रोकने के लिए सभी राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साझा मंच  बनाने का समय आ गया है. इसके लिए अदालतें और पुलिस पर्याप्त नहीं हैं. 

मैंने एक बार एक मुख्यमंत्री को सुझाव दिया था कि राज्य सरकार को सभी संप्रदायों के धार्मिक नेताओं, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, पुलिस अधिकारियों, न्यायविदों, राजनीतिक नेताओं, समाज सुधारकों और महिला संगठनों को शामिल करते हुए संयुक्त बैठकें और विचार-विमर्श आयोजित करने चाहिए ताकि पहले सभी पहलुओं से इस मुद्दे को समझा जा सके और फिर बलात्कारों पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया जा सके. 

इस प्रयास में पूरे समाज को एकजुट होना चाहिए. लेकिन संबंधित मुख्यमंत्री ने केवल इतना कहा कि 'अधिकांश बलात्कार रिश्तेदारों और परिचित व्यक्तियों द्वारा किए जाते हैं और सरकार इसमें शायद ही कुछ कर सकती है.' लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि राज्यों को एक-दूसरे को यह दिखाना चाहिए कि उन्होंने महिलाओं के खिलाफ इस अपराध पर किस तरह सफल लड़ाई  लड़ी है और लगाम कसी है. 

बढ़ते बलात्कार सभी सरकारों पर सबसे बड़ा दाग हैं. असम, मध्यप्रदेश और अब महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लाड़ली बहना जैसी योजनाएं शुरू करने और हर महीने मुफ्त में पैसे बांटने के बजाय, मुख्यमंत्रियों को महिलाओं की सुरक्षा पर करदाताओं का पैसा खर्च करना चाहिए. 

सरकारी और निजी क्षेत्र के सभी वास्तविक आंकड़े बताते हैं कि एक असहाय महिला के साथ बलात्कार की प्रवृत्ति - चाहे वह नाबालिग लड़की हो या वयस्क डॉक्टर - लगातार बढ़ रही है. कानून का डर पूरी तरह से गायब है, वरना अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के पुरुषों की पाशविकता दिखाने वाले दिल दहलाने वाले अपराध कम हो सकते थे. 

चूंकि पुलिस - जो कई बार अपराध में शामिल होती है - अपराधियों को प्रभावी ढंग से पकड़ने में असमर्थ रही है, इसलिए लोगों का उस पर भरोसा और कम हो गया है.दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों से निपटने के लिए कई प्रयास किए गए थे. लेकिन तब ज्यादातर विपक्षी दलों ने डॉ. मनमोहन सिंह सरकार को दोषी ठहराया था. 

आज बंगाल में तो नहीं लेकिन देश के ज्यादातर हिस्सों में व केंद्र में भाजपा की सरकार है. लंबे समय से महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में कोलकाता जैसी घटना होना जले पर नमक पड़ने जैसा है. डॉक्टर के बलात्कार और उसकी हत्या से जुड़ी घटनाओं की पूरी जानकारी सीबीआई की रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगी. लेकिन देश को सीबीआई से ऐसे अमानवीय अपराध की निष्पक्ष जांच की उम्मीद है. 

ममता बनर्जी को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और पूरी ईमानदारी से घटना की जांच में हर संभव मदद करनी चाहिए. राजनीति कतई बीच में नहीं आनी चाहिए. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़ों से पता चलता है कि हर दिन बलात्कार के 90 मामले दर्ज किए गए. हम आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने मामले दर्ज ही नहीं किए गए होंगे.

बलात्कार और हत्याएं हर सरकार की नाक के नीचे हो रही हैं. वर्ष 2012 में कोलकाता के एक नाइट क्लब में एक महिला के साथ बलात्कार हुआ; फिर दिसंबर में निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. फिर हाथरस, भोपाल, कठुआ, हैदराबाद, नई दिल्ली, लखनऊ और फिर मणिपुर की घटनाएं होती चली गईं. 

कोलकाता और बदलापुर की घटनाएं दिखाती हैं कि इस तरह के अपराध की घटनाओं में कोई भी कमी नहीं आई है. क्या भारत के वैभवशाली इतिहास में कभी भी लड़के और पुरुष इतने वहशी रहे हैं? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है! खैर, किसी एक राजनीतिक दल को दोषी ठहराने से कोई फायदा नहीं हो सकता. महिलाओं की सुरक्षा के लिए हमें कुछ अलग हटकर सोचने की जरूरत है. 

मध्यप्रदेश सरकार ने 2017 में नाबालिग लड़कियों के बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड का कानून बनाया था. लेकिन इससे ऐसे अपराधों में कोई कमी नहीं आई, जो दुःखद है. मेरा दृढ़ता से मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सभी मुख्यमंत्रियों के साथ इस मामले को लेकर एक दिवसीय बैठक बुलाकर स्थायी समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए. 'अमृत-काल' में होनेवाली कोलकाता और बदलापुर जैसी भयावह घटनाएं रुकनी ही चाहिए.

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