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सारंग थत्ते का ब्लॉग: 12000 फुट की ऊंचाई पर आस्था की संगत

By सारंग थत्ते | Updated: November 12, 2019 07:12 IST

1970 में लेह से नीमु के लिए सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ. इस रास्ते के निर्माण में यह पत्थर सड़क के बीच में आ रहा था. काम को रोकना पड़ा, क्योंकि वहां मौजूद कारीगरों के लिए उस पत्थर को हटाना नामुमकिन था.

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लेह से कारगिल की ओर जाने वाली सड़क पर आस्था का एक अद्भुत स्थान है. 1517-18 में गुरुनानक देवजी ने अपनी यात्ना में तिब्बत का भी रुख किया था. वहां से वापस श्रीनगर आने के लिए जब वे निकले तो लेह के पास नदी किनारे उन्होंने डेरा डाला था.

उस इलाके  में मौजूद एक असुर राक्षस की वजह से इलाके के लोग डरे हुए थे. गुरुनानक देवजी को जब लोगों की व्यथा सुनाई दी तब वे उनकी रक्षा के लिए इस इलाके में पधारे थे. इलाके के आम बाशिंदे गुरुनानक देवजी को गुरुनानक लामा नाम से पुकारते थे. गुरुनानक देवजी वहां के लोगों को उपदेश देते रहे और इस वजह से लोगों में उनके प्रति आस्था और जागृत हुई. किंवदंती के अनुसार राक्षस ने गुरुनानक देवजी को मारने की ठान ली थी.

लेह से 25 किमी पर गुरुद्वारा पत्थर साहिब आज जहां मौजूद है वहीं उस राक्षस ने गुरुनानक देवजी,  जो ध्यान कर रहे थे, के ऊपर एक बहुत बड़ा पत्थर पीछे की पहाड़ी से नीचे लुढ़का दिया. जैसे-जैसे पत्थर नीचे की तरफ आया उसकी गति बढ़ती गई लेकिन जैसे ही इस पत्थर ने गुरुनानक देवजी के पावन शरीर को छुआ, वह पत्थर पिघले हुए मोम की तरह हो गया और गुरुनानक देवजी की पीठ पर आकर रु क गया. गुरुनानक देवजी को कुछ नहीं हुआ और वे अपने ध्यान में मग्न थे. राक्षस को लगा कि इतनी गति से आए हुए पत्थर ने गुरुनानक लामा को मार दिया होगा.

नीचे आने पर दानव ने देखा कि उनको कुछ नहीं हुआ है तो उसे इस चमत्कार पर विश्वास नहीं हुआ और गुस्से में उस दानव ने अपने दाहिने पैर से उस पत्थर को लात मारी. ऐसा करते हुए उसका पैर उस पत्थर में धंस गया, जैसे-तैसे अपने पैर को उसने छुड़ाया. अब उसे महान गुरुनानक लामा की आध्यात्मिक शक्ति का एहसास हुआ और वह उनके चरणों में गिर पड़ा. उसने गुरुनानक देवजी से माफी मांगी, जिस पर उन्होंने उसे माफ किया और अच्छे इंसान के रूप में रहने की सलाह दी. आज भी उस पत्थर पर गुरुनानक देवजी के पीठ, कंधे और सिर के निशान मौजूद हैं, साथ ही उस राक्षस के दाहिने पैर की भी छाप बेहद साफ नजर आती है.

1970 में लेह से नीमु के लिए सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ. इस रास्ते के निर्माण में यह पत्थर सड़क के बीच में आ रहा था. काम को रोकना पड़ा, क्योंकि वहां मौजूद कारीगरों के लिए उस पत्थर को हटाना नामुमकिन था. भारी बुलडोजर मंगाए गए लेकिन यह पत्थर जिसे वहां के आम नागरिक नानक लामा के चमत्कार की वजह से पूजते आए थे, नहीं हिला पाए.

अगले दिन सुबह तक वहां कई तिब्बती और लद्दाखी बाशिंदे एकत्रित हो गए एवं उस पूजनीय पत्थर की कहानी बयान हुई. उस स्थान पर फिर एक गुरुद्वारा बनाया गया जिसमें सबने मदद की. आज यह गुरुद्वारा सेना की जवाबदारी में है और इसे बेहद कुशल तरीके से चलाया जाता है. 

टॅग्स :गुरु नानक
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