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राफेल मामले में सरकार पारदर्शिता अपनाए

By पवन के वर्मा | Updated: October 8, 2018 21:37 IST

विमान की संशोधित कीमत को गुप्त रखने के प्रारंभिक प्रयास शायद ही विश्वसनीय थे, क्योंकि मूल्य निर्धारण के अधिकांश तत्व पहले से ही सार्वजनिक जानकारी में थे।

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पवन के. वर्मा

राफेल सौदे में कुछ स्पष्टता की आवश्यकता है। इसमें संदेह नहीं कि भारतीय वायु सेना को अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की बेहद जरूरत है। यह तथ्य भी कि हमें उन्हें विदेश से खरीदने की जरूरत है, निर्विवाद्य है। अत्याधुनिक विमानों या हथियारों का निर्माण करने की हमारी क्षमता बहुत सीमित है।  

यह सही है कि दिसंबर 2012 में पिछली यूपीए सरकार द्वारा किए गए समझौते में राफेल कीमत और रणनीतिक आवश्यकताओं के मामले में सबसे स्वीकार्य विमान था। वह सौदा 126 विमानों के लिए था, जिसमें से 18 विमान चालू हालत में फ्रांस से आने थे और बाकी विमानों का निर्माण तकनीक के हस्तांतरण के जरिए भारत में ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लि। (एचएएल) द्वारा किया जाना था। इस समझौते के अंतर्गत 70 प्रतिशत काम एचएएल द्वारा किया जाना था और डसाल्ट एविएशन द्वारा बाकी 30 प्रतिशत काम किया जाना था। इस ‘वर्कशेयर एग्रीमेंट’ पर मार्च 2014 में दस्तखत किए गए थे, जो कि 36 हजार करोड़ रु। का था। इस सौदे में प्रति विमान मूल्य 526।1 करोड़ रु। होने का खुलासा किया गया था। 

यह भी सच है कि अप्रैल 2015 में फ्रांस की अपनी यात्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले के सौदे को रद्द कर दिया था और प्रति विमान 1670 करोड़ रु। की लागत से 36 विमान खरीदने की घोषणा की थी। यह मूल्य पिछले सौदे की तुलना में प्रति विमान लगभग तीन गुना था। इस कीमत का सार्वजनिक तौर पर खुलासा डसाल्ट एविएशन ने 2016 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में किया था। यह भी ज्ञातव्य है कि संशोधित सौदे में एचएएल को भारतीय साङोदार के रूप में छोड़ दिया गया था। डसाल्ट ने कई भारतीय कॉर्पोरेट इकाइयों के साथ भागीदारी की, जिसमें सबसे प्रमुख अनिल अंबानी का रिलायंस समूह था।

इन तथ्यों के मद्देनजर, सरकार से विपक्ष पूछ रहा है कि विमान की कीमत पहले की तुलना में तीन गुना क्यों बढ़ गई है। विपक्ष यह भी जानना चाहता है कि एचएएल को बाहर क्यों कर दिया गया और उसकी जगह रिलायंस समूह को डसाल्ट द्वारा ऑफसेट क्लॉज के अनुसार लाया गया? विपक्ष इस मुद्दे को मजबूती से उठाना चाहता है, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार बेहतर तरीके से अपना बचाव नहीं कर पा रही है। 

विमान की संशोधित कीमत को गुप्त रखने के प्रारंभिक प्रयास शायद ही विश्वसनीय थे, क्योंकि मूल्य निर्धारण के अधिकांश तत्व पहले से ही सार्वजनिक जानकारी में थे। एक के बाद दूसरे विरोधाभासी बयानों से इस धारणा को मजबूती मिली कि सरकार के पास  छिपाने के लिए कुछ था। इसलिए सरकार के लिए सबसे अच्छा उपाय पारदर्शिता से काम करना होगा। यदि सौदे में कुछ भी गलत नहीं है तो राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के अंतर्गत अधिकतम संभव जानकारी क्यों नहीं साझा की जाती? प्रति विमान कीमत तीन गुना बढ़ने को विश्वसनीय रूप से समझाया जाना चाहिए। यदि सरकार अपनी निदरेषिता के प्रति आश्वस्त है तो उसे संयुक्त संसदीय समिति के गठन पर सहमत हो जाना चाहिए।

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