गिरेबां में झांकने की जरूरत: क्या शहर स्मार्ट हुए ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 24, 2026 07:29 IST2026-04-24T07:28:08+5:302026-04-24T07:29:11+5:30

कचरा प्रबंधन पर नवी मुंबई ने वाकई श्रेष्ठ काम किया है. दूसरे स्थान पर सूरत है. सफाई के मामले में नागपुर 27 वें स्थान पर और छत्रपति संभाजीनगर 30 वें पायदान पर है.

Need to look within: Have cities become smart | गिरेबां में झांकने की जरूरत: क्या शहर स्मार्ट हुए ?

गिरेबां में झांकने की जरूरत: क्या शहर स्मार्ट हुए ?

जिस परियोजना को बुनियादी तौर पर पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, वो परियोजना महाराष्ट्र में पंद्रह साल से ज्यादा चली और अब समाप्त हुई है. परियोजनाओं के लिए जो विशेष व्यवस्था की गई थी, उसे समाप्त कर दिया गया है. इसके लिए अलग से कर्मचारी नहीं होंगे और परियोजना के तहत हुए कार्यों की जिम्मेदारी महानगरपालिका को सौंप दी गई है.

तो बुनियादी सवाल है कि परियोजना को किस हद तक सफल कहा जाए?  महाराष्ट्र में स्मार्ट सिटी परियोजना की शुरुआत 25 जून 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी. परियोजना में मुख्य रूप से छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर, कल्याण-डोंबिवली, नासिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड, सोलापुर और ठाणे को शामिल किया गया. परियोजना का उद्देश्य बेहतर बुनियादी ढांचा, कुशल सेवाएं और टिकाऊ पर्यावरण के माध्यम से शहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना था. सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलेगा कि इन शहरों में कुल मिलाकर 300 से ज्यादा परियोजनाएं या तो पूरी हो चुकी हैं या फिर अंतिम चरण में हैं.

अच्छी बात है. आंकड़ों का  स्वागत किया जाना चाहिए. मगर कुछ बुनियादी सवालों पर भी गौर करना जरूरी है. इसी परियोजना के तहत सफाई के मामले में मध्यप्रदेश का इंदौर शहर पिछले आठ वर्षों से शिखर पर बना हुआ है. सवाल यह है कि विकसित माने जाने वाले महाराष्ट्र का कोई शहर प्रथम पायदान पर एक साल भी क्यों नहीं आ पाया? हां, नवी मुंबई पर हम गर्व कर सकते हैं जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार तीसरे स्थान पर बना हुआ है.

कचरा प्रबंधन पर नवी मुंबई ने वाकई श्रेष्ठ काम किया है. दूसरे स्थान पर सूरत है. सफाई के मामले में नागपुर 27 वें स्थान पर और छत्रपति संभाजीनगर 30 वें पायदान पर है. क्या स्थिति इससे बेहतर नहीं हो सकती थी? और स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत जो काम हुए हैं, उनका सदुपयोग कितना हो रहा है? उदाहरण के लिए नागपुर में लगे हुए कैमरों की बात करें तो पूरा शहर ट्रैफिक की अराजकता का शिकार है और बहुत से कैमरे बंद पड़े हैं. दूसरे शहरों में भी यही हाल है.

किसी भी शहर की गुणवत्ता मुख्यत: दो बातों से आंकी जाती है. पहला कि वहां साफ-सफाई कितनी है और दूसरा सड़क कैसी है, उस पर ट्रैफिक व्यवस्था कैसी है. एक और बड़ा मुद्दा सार्वजनिक शौचालयों का है. क्या हम इन कसौटियों पर खरा उतर रहे हैं? यदि आप नागपुर या छत्रपति संभाजीनगर में रहते हैं और अपने जनप्रतिनिधि से पूछेंगे कि शहर में कितने सार्वजनिक शौचालय हैं तो वे बड़े आंकड़े आपके सामने रख देंगे. मगर आंकड़ों का ढिंढोरा पीटने के बजाय हमें अपने गिरेबां में झांकना चाहिए कि सच क्या है? हम सच का सामना नहीं करेंगे तो बेहतर होने की उम्मीद कैसे करेंगे?

Web Title: Need to look within: Have cities become smart

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