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संपादकीय: चुनावी तैयारियों का दिखने लगा है असर

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: December 24, 2018 09:40 IST

सरकार एक तरफ यह भी कह रही है कि जीएसटी की वसूली कम हुई है और वहीं जीएसटी दरों में नई कटौती की घोषणा से घाटा बढ़ेगा. इससे साफ है कि उसकी नजर चुनाव पर है.

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बीत जाने के बाद अब केंद्र की भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार आम चुनावों की तैयारी में जुट चुकी है. लोकलुभावन वादों के अलावा उसके पास सरकारी खजाने को लुटाने का भी अधिकार प्राप्त है, जिसके  बल पर पिछली सभी सरकारों की भांति ही पहले सरकारी और फिर राजनीतिक स्तर पर आम आदमी को अपने पक्ष में करने की कोशिश की जा रही है. शनिवार को जीएसटी काउंसिल की 31वीं बैठक के बहाने केंद्र सरकार ने जीएसटी की वसूली को अच्छा नहीं बताया. महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल को छोड़कर किसी दूसरे राज्य में वसूली अच्छी नहीं रही. किंतु इसका असर सरकारी घोषणा पर नहीं दिखा. 

उसने सबसे बड़े स्तर 28 प्रतिशत की छह वस्तुओं को 18 प्रतिशत, 18 प्रतिशत की दर पर जीएसटी भरने वाली 17 वस्तुओं को 12 और पांच फीसदी के दायरे में पहुंचा दिया. इस बदलाव के लाभ क्षेत्र में टीवी, टायर, लीथियम बैटरी, जूते-चप्पल, थर्ड पार्टी वाहन बीमा, तीर्थ यात्र आदि आते हैं. हालांकि एक अंतराल के बाद जीएसटी काउंसिल की बैठक होती है, मगर आम चुनाव को नजदीक देखते हुए सरकारी घोषणाओं को चुनाव से अलग नहीं देखा जा सकता है. वह भी जब भाजपा ने तीन राज्यों में सत्ता गंवाई है. साफ है कि पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल-डीजल के दामों के बहाने महंगाई की चर्चा ने अच्छी खासी हवा पाई थी. 

उस समय सीमित उपाय होने से सरकार कुछ नहीं कर पाई थी. पेट्रोल-डीजल के दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटने से अपने आप कम होने लगे. इसके अलावा बाकी चीजों और बाजार को बेहतर बनाने के लिए सरकार से अपेक्षा थी, जिसे उसने पूरा किया. हालांकि सरकार एक तरफ यह भी कह रही है कि जीएसटी की वसूली कम हुई है और वहीं जीएसटी दरों में नई कटौती की घोषणा से घाटा बढ़ेगा. इससे साफ है कि उसकी नजर चुनाव पर है. उसे यह समझ में आ चुका है कि जीएसटी तो वह आगे-पीछे वसूली कर लेगी, किंतु घाटे की भरपाई के इंतजार में उसे जनता के वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए उसने सावधानी के साथ कदम उठा लिया. फिलहाल कुछ अपेक्षाएं पूरी हुई हैं और सीमेंट की अपेक्षा अभी बाकी है. संभव है सरकार निर्माण उद्योग को लाभ पहुंचाने के लिए कदम उठाए. वर्तमान में थोड़ा ही सही, इंतजार का कुछ तो फल मिला है, चाहे वह किसी सबक के बाद क्यों न मिला हो.

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