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डेरेक ओ ब्रायन का ब्लॉग: अनियोजित लॉकडाउन से गहराती जा रही मंदी

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: June 25, 2020 06:20 IST

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ठळक मुद्देअप्रैल में बेरोजगारी दर बढ़ कर 23.8 प्रतिशत हो गई जो एक और सर्वकालिक उच्च दर है. लॉकडाउन के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में ऐसी बहुत सी चीजें नहीं की गईं जिन्हें किया जाना चाहिए था

डेरेक ओ ब्रायन

आज से ठीक तीन महीने पहले, कोरोना वायरस महामारी से निपटने के नाम पर 21 दिनों का पहला लॉकडाउन शुरू किया गया था. हमारे समय की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों से परामर्श किए बिना, सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी. लेकिन लॉकडाउन हमारे समय की सबसे बड़ी विफलता साबित हुआ है. यह मैं अपने दृष्टिकोण नहीं बल्कि ठोस आंकड़ों के आधार पर कह रहा हूं. जब लॉकडाउन शुरू हुआ उस समय 25 मार्च को भारत में नए मामलों की संख्या 86 थी. एक जून को, जब अनलॉक-1 लागू किया गया, पोस्ट लॉकडाउन चरण में, संक्रमण के नए मामलों की संख्या थी 7723. तीन सप्ताह बाद (21 जून को) यह संख्या 15140 थी और लगातार बढ़ती ही जा रही है. मामलों की संख्या मई के अंत तक या जब तक का भी स्वास्थ्य मंत्रालय की ब्रीफिंग में वादा किया गया था, स्थिर या कम होने की बजाय  बढ़ती ही जा रही है. भारत में अब जुलाई के अंत या अगस्त तक मामलों की संख्या चरम पर पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है. कोई भी इस बारे में पूरे विश्वास के साथ कुछ नहीं कह सकता.

लॉकडाउन के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में ऐसी बहुत सी चीजें नहीं की गईं जिन्हें किया जाना चाहिए था. उस समय का टेस्टिंग और अन्य क्षमताओं को जांचने के लिए सदुपयोग नहीं किया गया. तीन महीने बाद, कोविड-19 के मामलों की संख्या में भारत दुनिया में चौथे नंबर पर हैै लेकिन प्रति मिलियन टेस्टिंग में वह 137वें स्थान पर है. प्रारंभ में, केंद्र ने राज्यों को पर्याप्त संख्या में किटों की आपूर्ति नहीं की. राज्यों को भेजे गए किट दोषपूर्ण और अनुपयोगी थे.

लॉकडाउन की भारी आर्थिक लागत थी. मार्च में जब कोरोना संकट स्पष्ट रूप से सामने आया, सरकार के कई हफ्तों के इंकार के बावजूद, अंत में छह बिलियन डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश भारत के बाहर चला गया जो कि सर्वकालिक उच्च दर है. अप्रैल में बेरोजगारी दर बढ़ कर 23.8 प्रतिशत हो गई जो एक और सर्वकालिक उच्च दर है. अप्रैल में भारतीय निर्यात में भी 60 प्रतिशत की गिरावट आई.हर पांच में से दो एमएसएमई और स्व-नियोजित व्यवसाय बंद होने लगे हैैं. क्लॉथ मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन आॅफ इंडिया के अनुसार टेक्सटाइल की बिक्री में 86 प्रतिशत की गिरावट आई है.

कुल 21 दिनों के पहले लॉकडाउन में भारत को अनुमानत: 35000 करोड़ रु. का नुकसान प्रतिदिन उठाना पड़ा. 9.2 करोड़ शहरी और 8.9 करोड़ ग्रामीण भारतीयों की जमापूंजी लॉकडाउन के पहले 21 दिनों के भीतर समाप्त हो गई. जून के अंत तक 13.9 करोड़ शहरी भारतीयों की जमापूंजी खत्म हो सकती है.  प्रवासी श्रमिकों का क्या हाल हुआ, सभी जानते हैैं. उन्हें एक मई तक ट्रेनों से वंचित रखा गया और उसके बाद भी यात्रा के लिए टिकट खरीदने पर मजबूर किया गया. क्या आप जानते हंै कि लॉकडाउन के दौरान गैर-कोविड मृतकों की संख्या कितनी है? लॉकडाउन के दौरान थकान से 47, भुखमरी और वित्तीय संकट से 167, चिकित्सा सहायता नहीं मिलने से 63 लोगों की मौत हुई. अपने घर जाने की कोशिश करने वाले 209 प्रवासी श्रमिकों और ट्रेनों में 95 प्रवासी श्रमिकों की मृत्यु हुई. इस तरह कुल 581 ऐसी मौतें हुईं जिनका नॉवेल कोरोना वायरस से कोई संबंध नहीं है. ये मौतें सीधे-सीधे लॉकडाउन के खराब नियोजन व खराब निष्पादन से जुड़ी हैैं.

इसके लिए कौन जिम्मेदार है? कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन जैसी भयानक तबाही होने के बाद, व्यापार के लिए और उससे भी ज्यादा गरीबों तथा कमजोर वर्गों के लिए राहत पैकेज की दरकार होती है. जर्मनी की जीडीपी भारत की डेढ़ गुना और एल साल्वाडोर की भारत के सौवें हिस्से के बराबर है. इन दोनों देशों ने और कई अन्य देशों ने भी उन लोगों के लिए उदारता के साथ नकद हस्तांतरण की घोषणा की है जिन्हें इसकी आवश्यकता है. भारत में सरकार ने हमारे बीच के उन सबसे गरीब लोगों को भी नकद हस्तांतरण प्रदान करने से मना कर दिया है, जिनकी नौकरी चली गई है और जिन्हें किसी आय की कोई उम्मीद नहीं है. इसके बजाय राहत पैकेज के रूप में 20 लाख करोड़ रुपए के कर्ज देने के कार्यक्रम की घोषणा की गई है.

क्या कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए किसी प्रकार का लॉकडाउन आवश्यक था? बेशक था. क्या सरकार ने पूरी तैयारियों और सावधिक प्रणालीगत बेहतरी साथ हमें वह लॉकडाउन दिया जिसके हम हकदार थे? इसका उत्तर निश्चित रूप से  है, ‘नहीं’. परिणाम एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो 2020 की शुरुआत से ही डूबी हुई होने के बाद अब पहले से भी खराब हालत में पहुंच गई है. स्वतंत्रता के बाद के इतिहास की यह सबसे गहरी मंदी है. यह पिछले तीन महीनों की दुर्भाग्यपूर्ण विरासत है.

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