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लाेकतंत्र में मतदान वस्तुत: व्यक्तियों का नहीं, एक व्यवस्था का चुनाव है?

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: November 27, 2025 14:02 IST

अपने बड़े-बड़े नेताओं को, सबसे बड़े नेता को भी, न जाने कितनी बार संविधान की कस्में खाते देखा है, हमारे नेता यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि देश का संविधान उनके लिए सबसे बड़ी धार्मिक पुस्तक है.

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ठळक मुद्देदूसरे नागरिकों के कल्याण के बारे में भी सोचते हैं.संविधान समानता की बात करता हैअपने ही जैसे दूसरे नागरिकों के कल्याण के बारे में भी सोचते हैं.

जिस जनतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपने लिए स्वीकारा है उसमें मतदान का बहुत व्यापक अर्थ है, और बहुत बड़ा अर्थ है. मतदान के द्वारा हम न केवल उनका चुनाव करते हैं जो हमारा प्रतिनिधित्व अथवा नेतृत्व करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि हम न्याय और बंधुता के पक्ष में खड़े है; हम सिर्फ अपने ही हित के लिए नहीं, अपने ही जैसे दूसरे नागरिकों के कल्याण के बारे में भी सोचते हैं.

मतदान वस्तुत: व्यक्तियों का नहीं, एक व्यवस्था का चुनाव है. यह बात समझने और स्वीकारने के बाद हमें यह सोचने है कि मतदान केंद्र पर जाकर हम जो वोट डाल आए हैं, क्या वह उन आदर्शों और मूल्यों के पक्ष में हुआ है या फिर अपने स्वार्थों और अपनी अज्ञानता के चलते हम कोई घटिया समझौता कर आए हैं? ऐसा कोई भी समझौता किसी अपराध से कम नहीं होता.

इसलिए, पेटी में वोट डालने अथवा मशीन का बटन दबाने से पहले जागरूक मतदाता को दस बार सोचना चाहिए कि उसका यह कार्य उस संविधान के अनुरूप है या नहीं जिसने हमें मतदान का अधिकार दिया है? हम और हमारे नेता संविधान के प्रति आदर दिखाने में भले ही पीछे न रहते हों, पर संविधान को सिर झुकाना और बात है, संविधान के प्रति ईमानदारी से निष्ठावान होना और बात.

हमने अपने बड़े-बड़े नेताओं को, सबसे बड़े नेता को भी, न जाने कितनी बार संविधान की कस्में खाते देखा है, हमारे नेता यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि देश का संविधान उनके लिए सबसे बड़ी धार्मिक पुस्तक है. पर इस सबसे बड़ी धार्मिक पुस्तक के प्रति उनका व्यवहार कैसा है? संविधान समानता की बात करता है, हमारे नेता असमानता की होड़ में लगे दिखाई देते हैं.

संविधान कहता है धर्म या जाति के आधार पर देश में कोई भेद-भाव नहीं होना चाहिए, हमारे नेता धर्म के आधार पर वोट बैंक बनाने में लगे रहते हैं. मेरा धर्म और तेरा धर्म की लड़ाई खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही. लोगों को इस बात पर भी आपत्ति है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने `रघुपति राघव राजाराम' वाले भजन में `ईश्वर-अल्लाह तेरा नाम' क्यों जोड़ दिया था!

हमारा संविधान देश के नागरिकों के बीच बंधुता के आदर्श की दुहाई देता है, हम इस आदर्श की धज्जियां उड़ाने में लगे हैं. समाज को बांटने वाली जो स्थितियां  आज देश में दिख रही हैं, कोई धर्म की दुहाई दे रहा है, कोई जाति के नाम पर समर्थन मांग रहा है, उससे एक भय-सा लगने लगा है. विश्व कवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक भय-मुक्त वातावरण में अपने देश के उदय होने की प्रार्थना की थी,

वह प्रार्थना तभी पूरी हो सकता है, जब हम समाज को बांटने वाली ताकतों को सफल न होने दें. नागरिक अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता का तकाज़ा है कि हम अपने संविधान की भावना को अपने आचरण का हिस्सा बनायें. इस संदर्भ में अभी जो दिख रहा है, वह कुल मिलाकर निराश ही करने वाला है. ज़रूरी है कि हम इस अवधारणा को अपने सोच और व्यवहार का हिस्सा बनायें कि सबसे पहले, और सबसे बाद में भी, हम भारतीय हैं, फिर कुछ और.

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