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अतीक अहमद: अपराधियों का बड़ा बन जाना भी सरकार और प्रशासन की कमजोरी का ही नतीजा है

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: April 17, 2023 14:57 IST

उत्तर प्रदेश और बिहार में लंबे समय तक माफियाओं का खेल जारी रहा है. माफिया सरगनाओं की चर्चा की जाती है तो एक-दो नहीं, बल्कि दर्जन भर नाम सामने आ जाते हैं. कई जेल के भीतर से तो कई बाहर से अपनी गुंडागर्दी का कारोबार चलाते हैं.

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61 साल की उम्र और 44 साल का आपराधिक इतिहास यानी उत्तर प्रदेश का माफिया सरगना अतीक अहमद का परिचय, जिसकी शनिवार की रात हत्या कर दी गई. करीब आठ सौ करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का मालिक जो पांच बार विधायक और एक बार सांसद भी रह चुका था. अतीक की तरह उसके भाई अशरफ का भी आपराधिक इतिहास रहा और उस पर 52 मुकदमे चल रहे थे. 

यहां तक कि अतीक के दो बेटे भी अलग-अलग मामलों में जेल में बंद हैं, एक मुठभेड़ में मारा गया. दो नाबालिग भी अब गिरफ्तार हो चुके हैं. पत्नी भी फरार चल रही है. इतना सब जान कर आश्चर्य इस बात का है कि किसी आपराधिक चरित्र के व्यक्ति का इतना विस्तार कैसे हो जाता है? वह निर्दलीय, अपना दल, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी से भी चुनाव लड़ लेता है. वह अपनी छवि के चलते ही चुनाव भी जीत जाता है. 

स्पष्ट है कि इस स्थिति तक पहुंचना बिना राजनीतिक या प्रशासनिक समर्थन के संभव नहीं है. महज 17 साल की उम्र में पहली बार हत्या का मामला दर्ज होना और उसके बाद वर्ष 1979 से लगातार अपराध करते रहना उत्तर प्रदेश राज्य की कानून और व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े करता है. किसी एक व्यक्ति के चार दशक के आपराधिक रिकॉर्ड से कोई एक सरकार पर दोष मढ़ने का भी बहाना नहीं मिल सकता है. 

इस अवधि में कोई ऐसा दल नहीं रहा, जिसकी वहां सरकार नहीं रही हो. बावजूद इसके अपराधी से माफिया और बाहुबली जैसे खिताबों को हासिल करना सरकारी कमजोरी और कहीं न कहीं सत्ताधारियों में इच्छाशक्ति के अभाव का परिचायक रहा. जब कभी, जहां कहीं भी अपराध और अपराधी संरक्षण पाने लगते हैं, वहां विकास की राह में अवरोध साफ नजर आने लगता है. जनता के बीच अविश्वास की भावना घर करने लगती है. 

उत्तर प्रदेश और बिहार में लंबे समय से यही होता आ रहा है. माफिया सरगनाओं की चर्चा की जाती है तो एक-दो नहीं, बल्कि दर्जन भर नाम सामने आ जाते हैं. कोई जेल के भीतर और कोई बाहर से अपनी गुंडागर्दी का कारोबार चलाता पाया जाता है. हाल के दिनों में उनका नेटवर्क देशव्यापी पाया जाने लगा है. ऐसे में केंद्र और राज्य दोनों ही इन स्थितियों को लेकर गंभीर नजर नहीं आए हैं. आपराधिक तत्वों पर दबिश दिखाई नहीं दी है. इसी कारण उनके हौसले बुलंद हैं. पैसा-संपत्ति से लेकर उनका नेटवर्क तक फैल चुका है. 

परिणाम अब सबके सामने है. चूंकि बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड के गवाह उमेश पाल की हत्या के बाद राज्य सरकार की किरकिरी हुई, इसलिए राज्य पुलिस की सक्रियता बढ़ी और मामला बढ़कर हत्या तक पहुंच गया. हालांकि इससे अदालत की ओर से न्याय मिलना, कई साजिशों तथा मददगारों के चेहरे से परदा हटना रह गया. किंतु इतनी पुरानी आपराधिक पृष्ठभूमि के अंत के साथ बाकी नए-पुराने माफिया सरगनाओं पर कार्रवाई को लेकर सवाल बाकी है. केवल जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाना और अदालती कार्रवाई चलते रहने देना सरकार और प्रशासन का मकसद नहीं होना चाहिए. जब तक सजा और उसका असर धरातल पर दिखाई नहीं देगा, तब तक आम आदमी का विश्वास व्यवस्था पर कायम नहीं होगा. 

इसलिए यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपराधियों का बड़ा होना भी सरकार और प्रशासन की कमजोरी का ही परिणाम है. जब भी इस कमी-कमजोरी का कारण मिल जाएगा, तो शायद यह भी समझ में आ जाएगा कि अपराधी इतने बड़े कैसे हो जाते हैं?

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