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सिद्धार्थ लूथरा का ब्लॉग: ट्रॉमा और हेल्थ केयर में ‘डाक’ योजना गेमचेंजर

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 3, 2020 19:53 IST

दुर्घटना होते देखकर वहां से गुजर रहे दो वाहन रुक गए. उनमें सवार तीन युवकों ने टैक्सी चालक को बाहर निकाला. ट्रक ड्राइवर का मौके से भागने का प्रयास विफल किया, पुलिस को तत्काल फोन किया और ड्राइवर तथा यात्री को निकट के अस्पताल तक पहुंचाने का इंतजाम किया.

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एक ऐसे शहर में, जो दंगों की विभीषिका से गुजर रहा हो, कुछ ऐसे भी क्षण देखने को मिले हैं जो दिल्ली निवासियों की सहज शालीनता और अच्छाई की वजह से इस शहर के लिए सकारात्मक भाव और उम्मीद की किरण जगाते हैं. करीब दस दिन पहले हमने दिल्ली के बाशिंदों की अच्छाई देखी जब एक खतरनाक दुर्घटना में टैक्सी में यात्र कर रहे परिवार के एक सदस्य को लोदी रोड पर तड़के तेज गति से आ रहे एक बड़े डम्पर ट्रक ने टक्कर मार दी. टैक्सी हालांकि बाईं ओर से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई लेकिन ड्राइवर और यात्री चमत्कारिक रूप से बच गए और उन्हें कुछ चोटें ही आईं. परंतु इसके बाद जो हुआ, वह दिखाता है कि दिल्ली के लिए उम्मीद बाकी है.

दुर्घटना होते देखकर वहां से गुजर रहे दो वाहन रुक गए. उनमें सवार तीन युवकों ने टैक्सी चालक को बाहर निकाला. ट्रक ड्राइवर का मौके से भागने का प्रयास विफल किया, पुलिस को तत्काल फोन किया और ड्राइवर तथा यात्री को निकट के अस्पताल तक पहुंचाने का इंतजाम किया. उस सुबह दो जानें उन तीन सहृदय युवाओं की वजह से बचाई जा सकीं जिन्होंने नागरिक के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह किया (जिसे हममें से कई लोग प्राय: भूल जाते हैं) और कानूनी झंझटों की परवाह किए बिना, दुर्घटना के बाद जल्दी ही घायलों को अस्पताल पहुंचाया.

सेव लाइफ फाउंडेशन की याचिका के संदर्भ में (2016), सुप्रीम कोर्ट ने मुसीबत में मदद करने वालों की सुरक्षा के लिए कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए थे और उन लोगों को कानूनी सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए कहा था जो दुर्घटना की सूचना देकर और घायलों को अस्पताल पहुंचाकर यातायात दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद करते हैं. दिल्ली पुलिस सहित अधिकांश पुलिस बलों ने इसे स्वेच्छा से स्वीकार किया है और अधिकांश अस्पताल इन मानदंडों को लागू कर रहे हैं.

उस तनावपूर्ण सुबह हमारे लिए एक और अद्भुत रहस्योद्घाटन हुआ. दुर्घटना के कुछ ही समय में हमारे पेशेंट को दक्षिण दिल्ली के मूलचंद हास्पिटल के इमर्जेसी वार्ड में ले जाया गया और हमारे पहुंचने के पहले ही इलाज शुरू किया जा चुका था. अच्छे डॉक्टरों और चिकित्सा सहायकों की एक टीम उन्हें सीटी स्कैन और एक्स रे के लिए ले गई क्योंकि पेशेंट के सीने और सिर में अंदरूनी चोट पहुंचने का संदेह था.

जब हम बिल के बारे में पूछने के लिए कैशियर के पास गए तो हमसे कहा गया, ‘‘चिंता मत कीजिए सर, यह एक डाक केस है.’’ उस सुबह पारंपरिक डाक (डाक सेवा) से संबंधित संदर्भ दिए जाने से मैं उलझन में पड़ गया. आखिरकार मुङो पता चला कि वे दिल्ली प्रशासन की योजना दिल्ली आरोग्य कोष (डाक) की  बात कर रहे थे. इसमें दिल्ली के निवासियों को एक्सीडेंट और ट्रॉमा के मामले में मुफ्त में चिकित्सा देखभाल प्रदान की जाती है जिसमें तत्काल सीटी स्कैन जैसी जांच और चिकित्सा शामिल है. सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में पं. परमानंद कटारा मामले में निर्देश दिया था कि आपातकालीन स्वास्थ्य देखभाल एक बुनियादी अधिकार है और हर व्यक्ति को उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

भारत सरकार के लिए नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना अनिवार्य है(अनुच्छेद 21) जिसमें स्वास्थ्य देखभाल का अधिकार भी शामिल है. फिर भी मौलिक अधिकार उतने ही अच्छे साबित होते हैं जितना सरकारें उन पर अमल करती हैं. सार्वभौमिक और नि:शुल्क आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा का प्रभावी क्रियान्वयन इस बहुमूल्य अधिकार को सुरक्षित करता है. ट्रॉमा केयर और हेल्थ केयर में डाक योजना नया गेमचेंजर है और अंतत: 1989 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्रियान्वयन है.

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