जख्मों के पार, उम्मीद की लाल रोशनी ‘रेडक्रॉस’

By योगेश कुमार गोयल | Updated: May 8, 2026 07:05 IST2026-05-08T07:05:07+5:302026-05-08T07:05:07+5:30

रेडक्रॉस न केवल युद्ध के समय बल्कि प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, महामारी तथा मानव निर्मित आपदाओं के समय भी राहत कार्यों में सबसे पहले सक्रिय होता है. विश्व में कहीं भी आपदा आती है तो रेडक्रॉस के स्वयंसेवकों की टीमें तुरंत वहां पहुंचकर राहत और पुनर्वास कार्य शुरू कर देती हैं.

Beyond the Wounds: The Red Light of Hope—The Red Cross | जख्मों के पार, उम्मीद की लाल रोशनी ‘रेडक्रॉस’

जख्मों के पार, उम्मीद की लाल रोशनी ‘रेडक्रॉस’

‘रेडक्रॉस’ पूरी दुनिया में निःस्वार्थ मानव सेवा का ऐसा प्रतीक बन चुकी है, जो सीमाओं, धर्मों, नस्लों और राजनीतिक विचारधाराओं से परे रहकर केवल इंसानियत के लिए समर्पित है. रेडक्रॉस की स्थापना के पीछे मूल भावना मानवता थी और आज भी यही इसकी आत्मा है. युद्ध के मैदान से शुरू हुआ यह आंदोलन अब दुनियाभर में मानवता की हर पुकार पर सबसे पहले पहुंचने वाला संगठन बन गया है. 

रेडक्रॉस न केवल युद्ध के समय बल्कि प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, महामारी तथा मानव निर्मित आपदाओं के समय भी राहत कार्यों में सबसे पहले सक्रिय होता है. विश्व में कहीं भी आपदा आती है तो रेडक्रॉस के स्वयंसेवकों की टीमें तुरंत वहां पहुंचकर राहत और पुनर्वास कार्य शुरू कर देती हैं. वर्तमान में रेडक्रॉस 190 से अधिक देशों में सक्रिय है और इसके 1.7 करोड़ से ज्यादा प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं, जो अपनी जान की परवाह किए बिना पीड़ितों की सेवा में लगे रहते हैं. 

समय के साथ रेडक्रॉस का कार्यक्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया है. आज यह संगठन रक्तदान, स्वच्छता, स्वास्थ्य जागरूकता, टीकाकरण, प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, खाद्य वितरण, पुनर्वास, सामाजिक समावेशन और स्वास्थ्य संसाधनों के वितरण तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

8 मई को ‘अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस दिवस’ मनाया जाता है, जो इसके संस्थापक जीन हेनरी डयूनेंट के जन्मदिवस का प्रतीक है, जिनका जन्म 8 मई 1828 को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में हुआ था. वे एक स्विस व्यापारी और समाजसेवक थे. 1859 में जब उन्होंने इटली के सालफिरोनो युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की हालत देखी तो वे भीतर तक हिल गए. युद्ध के मैदान में कोई चिकित्सा सुविधा नहीं थी, कोई उन्हें बचाने वाला नहीं था. 

इसी दर्दनाक अनुभव ने उनके मन में ऐसी पीड़ा और संवेदना उत्पन्न की कि उन्होंने न केवल एक पुस्तक ‘मेमोरी ऑफ सालफिरोनो’ लिखी बल्कि 1863 में रेडक्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति (आईसीआरसी) की स्थापना की. उनके इसी अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें 1901 में पहला नोबल शांति पुरस्कार भी प्रदान किया गया. 

डयूनेंट के प्रयासों से 1863 में जेनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें युद्ध में घायल सैनिकों के लिए सहायता समितियां बनाने, तटस्थता की अवधारणा को लागू करने और चिकित्सा कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने जैसे सिद्धांतों पर चर्चा हुई. उस बैठक के परिणामस्वरूप 1864 में ऐतिहासिक जेनेवा कन्वेंशन हुआ, जिसमें सफेद पृष्ठभूमि पर लाल क्रॉस का प्रतीक चिह्न तय किया गया. 

इस चिह्न ने न केवल युद्धभूमि में आशा का प्रतीक बनने की शुरुआत की बल्कि यह एक वैश्विक आदर्श बन गया. जेनेवा कन्वेंशन में युद्ध के घायलों का सम्मान, तटस्थता और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा जैसे सिद्धांतों को मान्यता मिली, जो आज भी प्रासंगिक हैं.

रेडक्रॉस न केवल युद्धबंदियों के लिए कार्य करता है बल्कि शरणार्थियों, विस्थापितों और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में फंसे नागरिकों के लिए भी यह संस्था मदद का सबसे बड़ा स्रोत है. रेडक्रॉस पूरी दुनिया को एक ही संदेश देता है कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है और सेवा सबसे बड़ी पूजा.

Web Title: Beyond the Wounds: The Red Light of Hope—The Red Cross

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