सुनील सोनी
धरती पर इंसानों के काबिज होते चले जाने के दौर में पहली बार प्रकृति ने जब गहरी सांस भरी थी, वह वक्त था वर्ष 2021. कोरोना महामारी में लॉकडाउन ने सब थाम दिया था. तमाम कारखाने बंद थे, हवाईजहाज उड़ान नहीं भर रहे थे, सड़कें सूनी पड़ी थीं, ज्यादातर लोग घरों में कैद थे. तब धरती जाग उठी थी... वीरान शहरों में तरह-तरह के पंछी चहचहाकर गीत गा रहे थे, जंगली जानवर सड़कों पर निकल आए थे, नई-नई प्रजातियां दिख रही थीं, जहाजों से समंदर आजाद हो गया था, व्हेल नई आवाजों से बतिया रही थीं, चिमनियां खामोश थीं और धुएं का जहर आसमान से नदारद था, गाड़ियों का थमा हुआ शोर कानों को सुकून दे रहा था. चमत्कार के वे क्षण सर डेविड एटनबरो ने ‘द ईयर अर्थ चेंज्ड’ नाम की डॉक्युमेंटरी से दुनिया तक पहुंचाए.
यह आईना था कि अगर इंसान की जल-जंगल-जमीन पर कब्जे की भूख कम हो, तो कुछ ही देर में धरती खुद को ठीक कर सकती है, प्रकृति ने जो खोया है, उसे वापस पा सकती है. 8 मई 2026 को डेविड एटनबरो 100 वर्ष के हो गए हैं और इसके जश्न में न केवल इंसान, बल्कि जंगल, समंदर, पशु-पक्षी तक शामिल हैं.
डेविड एटनबरो यानी धरती का वह कथाकार, जिसे बचपन में ही जीवाश्म जोड़ने के शौक ने दुनिया को वह सुनाना-दिखाना सिखाया, जिसे अपनी ही उलझनों में डूबे इंसान भूल गए हैं. लिसेस्टर विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल फ्रेडरिक के तीन बेटों में से रिचर्ड और डेविड के कई कारनामे रहे हैं. सिनेमा में ‘गांधी’ को ले आनेवाले सर रिचर्ड एटनबरो के रास्ते पर चले छोटे भाई डेविड ने छोटे परदे पर ही कहानियां कहीं.
ये बायोपिक प्रकृति के ‘अन्य जीवन’ की थीं. बीबीसी ने पहले उन्हें खारिज किया, पर फिर चुना, तो पिछले 60 सालों में उन्होंने वह बनाया, जिसने वह बताया, जो कोई और न बता पाता. 30 साल की उम्र में 1956 में वे खाकी शर्ट और हाफ पैंट पहने बर्मी अजगर को बोरे में भरते दिखे, तो सफर को दिशा मिली.
1979 में ‘लाइफ ऑन अर्थ’ सीरीज ने टीवी को ‘बुद्धू बक्से’ के बजाय ‘बुद्धिसंदूक’ में बदल दिया. जीवन के विकास की यह गाथा अरबों साल की कहानी है, जिसे डेविड की आवाज ने जिंदा कर दिया. ‘मेकिंग लाइफ ऑन अर्थ : एटनबरो’ज ग्रेटेस्ट एडवेंचर’ में रवांडा के पहाड़ों में गोरिल्ला से मुलाकात के फ्लैशबैक में वे बुदबुदाते हैं, ‘‘वह सचमुच असाधारण क्षण था, कोई विशेष अनुभूति.’’
उनकी आवाज का जादू ‘ओशो’ के करीब है, जो चित्त शांत कर दे. कहानी कहते वक्त गहरी, शांत, लयबद्ध. तथ्यज, पर कविता की तरह. समुद्री लहर हो या जंगल का कोहरे या किसी छोटे से कीड़े के जीवन का वर्णन, उनकी आवाज मुग्ध कर देती है. प्रकृति के रंगों की खोज में कई विचित्र संयोगों ने उनकी कहानियों को मोहक बनाया.
जैसे 1998 में ‘लाइफ ऑफ बड्र्स’ की शूटिंग के दौरान स्कॉटलैंड में विशाल पक्षी ‘कैपरकेली’ का झपटना या पत्थरों को पेड़ से टकराकर कठफोड़वे को उसकी ही नकल से बेवकूफ बनाना. ‘डेविड एटनबरो : ए लाइफ ऑन अवर प्लानेट’ उनकी 60 साल की प्रकृति यात्रा की गवाही है, जबकि कोरोना के दौरान 31 देशों में 4 साल की शूटिंग से बनी ‘ए परफेक्ट प्लैनेट’ में संदेश था, ‘‘यह हमारी धरती को बचाने की नहीं, खुद को बचाने की बात है. सच यह है कि हमारे साथ हो या हमारे बिना, प्रकृति खुद को फिर से बना लेगी. यह हमारा आखिरी मौका है.’’
उन्होंने उपदेश दिए या नारे लगाए बिना; महज ब्लू व्हेल की भव्यता, छोटे-से कीड़े के संघर्ष, या ग्लेशियर का पिघलाव दिखाकर करोड़ों लोगों को प्रकृति से प्रेम करना सिखाया है. रॉयल अल्बर्ट हॉल में उनके ‘शरद: शतम’ के सम्मान में किस्सागोई, संगीत सभा और जंगली जानवरों की कहानियां कही-दिखाई गईं; ट्रैफलगर चौक पर प्रशंसक शेर, बाघ, भौंरों के साथ उनका भी रूप धरकर पहुंचे और गीत गाए.
यह संयोग ही है कि 1966 में ‘एटनबरो अभयारण्य’ की भी 60वीं सालगिरह है, जैसे कि उनकी जीवनी का जश्न. लेकिन, डेविड के जीवन के सौ बरस डॉ. सिल्विया अर्ल और डॉ. जेन गुडऑल से भी जुड़े हैं, जिन्हें मिलाकर प्रकृति की मानवीय त्रिमूर्ति पूरी होती है. डॉ. सिल्विया अर्ल ने समंदर की गहराइयों में पल रही नई दुनिया से बताया कि संसार उतना ही नहीं, जितना दिखता है.
वे चार माह की गर्भवती थीं, जब 30 मीटर गहरे समुद्र में उतरीं. फिर उस अंधेरी, पर अद्भुत दुनिया से उनका साथ कभी नहीं छूटा. उनका सुर भी डेविड एटनबरो का सुर ही है, ‘‘प्रकति के बिना हम कुछ नहीं.’’ डॉ. जेन गुडऑल साठ साल का जंगल अध्येता जीवन बिताने के बाद 90 की उम्र में पिछले अक्तूबर में गुजरीं, तो यह त्रिमूर्ति भंग हुई. ‘चिम्पैंजी की नर मां’ कही जानेवाली गुडऑल ने सिद्ध किया कि इंसानों और जानवरों के बीच उतनी दूरी नहीं, जितनी वे सोचते हैं. उनका ‘रूट एंड शूट’ अब भी लाखों बच्चों को कुदरत का दीवाना बना रहा है.