West Bengal BJP Election Results: पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का चुनाव परिणाम बहुतों के लिए एक तरह से जमीन खिसकने जैसा था. कुछ रो-गा कर रह गए तो कुछ के मन में पल रही खतरनाक हसरत सामने आई. इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक बयान जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के नेता मोहम्मद नूरुल हुदा ने दिया. उसने सोशल मडिया पर ममता बनर्जी से कहा कि वे पश्चिम बंगाल को भारत से आजाद घोषित कर दें तो उनके समर्थन में बांग्लादेश के 17 करोड़ लोग खड़े हैं. उसने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को भड़काने की हर संभव कोशिश भी की.
अब सवाल उठता है कि ये मोहम्मद नूरुल हुदा है कौन और उसकी हिम्मत कैसे हुई कि भारत के एक राज्य को देश से अलग करने का विस्फोटक संदेश किसी भारतीय नेता को दे? अपनी पार्टी में नूरुल हुदा अकेला नहीं है जो इस तरह के सपने पालता है. उसकी पार्टी का नजरिया घनघोर इस्लामी है जो दुनिया में किसी और कौम का शासन देखना ही नहीं चाहता.
जमात-ए-इस्लामी वह पार्टी है जिसने बांग्लादेश के गठन का ही विरोध किया था. जब पाकिस्तानी सेना बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में कत्लेआम कर रही थी तब जमात के लोग पाकिस्तानी फौज की आवभगत कर रहे थे. शेख हसीना इस तथ्य को जानती थीं इसलिए उन्होंने जमात पर प्रतिबंध लगा रखा था. जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश वास्तव में बांग्लादेश में एक आतंकी संगठन की तरह काम करता रहा है.
यह सर्वमान्य तथ्य है कि जमात बांग्लादेश में पाकिस्तान के हितों की न केवल रक्षा के लिए काम करता रहा है बल्कि वह गजवा-ए-हिंद को भी चरितार्थ करना चाहता है. ऐसी पार्टी के किसी नेता से हम आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं? नूरुल हुदा जिन दो शब्दों से बना है, वे दोनों ही शब्द अरबी मूल के हैं.
नूर का अर्थ प्रकाश और हुदा का अर्थ सही रास्ता होता है लेकिन इस शख्स के पास न प्रकाश है और न ही सही रास्ता. ये अपने देश को ही अंधेरी और सीलन भरी गुफा में ले जाना चाहता है तो हमारे बारे में कैसे अच्छा सोच सकता है? उसे लग रहा होगा कि वह अपील करेगा और घुसपैठ करके पश्चिम बंगाल में रह रहे बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान विद्रोह कर देंगे!
उसे पता नहीं कि भारतीय मुसलमान ऐसी हरकतों का जवाब देना खूब अच्छी तरह से जानते हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तत्काल हुदा के बयान की आलोचना की. बरेलवी ने तत्काल कहा कि कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोग भारत के मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश न करें.
भारत का मुसलमान बर्दाश्त नहीं करेगा. अन्य मुस्लिम नेताओं ने भी हुदा के बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है. और यह सही है कि हमें मो. नूरुल हुदा जैसे सनकी लोगों की कोई फिक्र नहीं करनी चाहिए लेकिन इस सवाल पर गौर जरूर करना चाहिए कि उसकी यह हिम्मत कैसे हुई कि वह ममता बनर्जी को ऐसी सलाह दे?
और इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि ममता बनर्जी ने अभी तक सार्वजनिक रूप से नूरूल हुदा को फटकार क्यों नहीं लगाई है? हो सकता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद वे सदमे में हों और उन्हें पता ही नहीं हो कि किसी कट्टरपंथी ने उन्हें इतनी खतरनाक सलाह दे डाली है! यही वो बिंदु है जिस पर गौर करने की जरूरत है कि हुदा को कैसे महसूस हुआ कि वह ममता बनर्जी को इस तरह का संदेश दे सकता है! क्या इसके लिए तुष्टिकरण की राजनीति जिम्मेदार है? यदि ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो प्रारंभिक चरण में धर्मनिरपेक्षता को उन्होंने अपनी सीढ़ी बनाई.
बड़ा सीधा सा गणित है कि बहुसंख्यक से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के बीच जो फर्क न करे यानी जिसकी सोच और कर्म धर्म से प्रभावित नहीं हो, उसे हम धर्मनिरपेक्ष कह सकते हैं. मगर वक्त के साथ ममता को यह महसूस होने लगा कि राजनीतिक रूप से यदि मुसलमानों को साथ लिया जाए तो एकमुश्त वोट बैंक उनके काम आ सकता है.
धीरे-धीरे उनकी सोच पर वोट बैंक हावी होने लगा. बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत पहुंचने वाले जत्थे के लिए पश्चिम बंगाल अभय आश्रय स्थल हो गया. यहां तक कि असम में जब हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने नकेल कसनी शुरू की तो वे सब पश्चिम बंगाल पहुंचने लगे. बड़ी सहूलियत से वहां उनके आधार कार्ड बनने लगे और वे देश के दूसरे हिस्सों में भी पहुंचने लगे.
खुफिया तंत्र ने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक को आगाह किया लेकिन ममता सुनने को तैयार नहीं थीं. लोग आरोप लगाने लगे कि ममता के लिए राजनीति पहले नंबर पर है, देश हित के बारे में वो नहीं सोच रही हैं. पश्चिम बंगाल के कई इलाकों की डेमोग्राफी बदल गई. जो ममता धर्मनिरपेक्ष मानी जाती थीं, वह मुस्लिम तुष्टिकरण से आगे बढ़ते हुए कब हिंदुत्व विरोधी हो गईं, यह शायद उन्हें भी पता नहीं चला होगा.
यह सब पश्चिम बंगाल के लोगों ने महसूस किया, इसलिए उन्हें चुनाव में धराशायी कर दिया. पराजय के बाद भी जब उन्होंने कहा कि वे इस्तीफा नहीं देने जा रही हैं तो उनकी सोच भले ही अपना राजनीतिक कद बनाए रखने और जुझारू तेवर दिखाने की हो लेकिन नूरुल हसन जैसे लोगों को लगा होगा कि वे विद्रोह करने जा रही हैं. इसीलिए इस तरह का संदेश देने की उसने हिम्मत की!
निश्चय ही यह अत्यंत गंभीर मामला है. नूरुल हसन जैसे लोगों को सबक सिखाना बहुत जरूरी है, अन्यथा ये गजवा-ए-हिंद का भ्रम पाले रहेंगे और घुसपैठियों को भेज कर ऐसे हालात पैदा करने की कोशिश करेंगे जो भारत के लिए खतरनाक बनता चला जाए! पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ का जो घोषणा पत्र जारी किया था, उस पर तत्काल अमल होना चाहिए!