प्रभु चावला
डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से ही अपनी पुरानी आदतों को ज्यादा आक्रामक और अपने सहयोगियों पर ज्यादा दबाव बनाया है. वह कूटनीति को साझेदारी के बजाय प्रदर्शन और सौदेबाजी को संवाद के बजाय वर्चस्व स्थापित करने के रूप में देखते हैं. अपने सहयोगियों के नेटवर्क को नया रूप देने के बजाय वह इस नेटवर्क को नए टैरिफ और नए अपमान के जरिये तोड़ रहे हैं. हालांकि भारत को निशाना बनाते हुए भी वह इसे डरा नहीं पाते. अमेरिका के साथ रिश्ते में भारत जूनियर पार्टनर नहीं है, जो वाशिंगटन की मंजूरी का इंतजार करे.
भारत एक सभ्यतागत शक्ति है, जो राजनीतिक स्थिरता, सांस्थानिक परिपक्वता व आर्थिक उभार के जरिये यहां तक पहुंचा है. ऐसे देश के बारे में ट्रम्प के नजरिये से साफ है कि उनकी सोच कितनी पुरानी है. पिछले सप्ताह अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक ने एक पॉडकास्ट में असाधारण टिप्पणी की. उनका कहना था कि भारत के साथ बड़ा व्यापार सौदा नीतिगत असहमति के कारण नहीं, बल्कि इस कारण रद्द हो गया, क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जरूरी वक्त पर अमेरिकी राष्ट्रपति से फोन पर बात नहीं की. यह वैश्विक कूटनीति को स्कूली ड्रामे में तब्दील कर देने जैसा है.
लुटनिक ने कूटनीति को ऐसे परिभाषित किया, मानो यह राजसभा की कोई परंपरा हो, जिसमें लाभ पाने के लिए नेताओं के लिए राजा के सामने झुकाना जरूरी हो. लुटनिक के मुताबिक, व्यापार समझौते पर सहमति के लिए भारत को 2025 में तीन मौके दिए गए, उसके बाद ही अमेरिका ने वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे एशियाई देशों का रुख किया.
लुटनिक ने यह टिप्पणी साफ तौर पर भारत को अपमानित करने के उद्देश्य से की. संदेश सुस्पष्ट था. देशहित नहीं, ट्रम्प के अहं की तुष्टि ही वाशिंगटन द्वारा व्यापारिक निर्णय लेने का आधार है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत ही इस अमेरिकी दावे का खंडन किया. आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि व्यापार, तकनीक और वैश्विक सुरक्षा के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच 2025 में आठ बार वार्ता हुई. जाहिर है, व्यापार वार्ता टेलीफोनिक शिष्टाचार के कारण नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती शर्तों और ट्रम्प की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के कारण अधर में लटक गई.
जाहिर है, यह अमेरिकी सिद्धांत नए भारत को मंजूर नहीं, जो आत्मनिर्भर तथा आत्मविश्वासी है, और जो खुद को छिछले भू-राजनीतिक खेलों में धकेला जाना गवारा नहीं करता. पर ट्रम्प यहीं नहीं रुके. वर्ष 2025 के अंत में राष्ट्रवादी नजरिये का परिचय देते हुए ट्रम्प ने सैंक्शनिंग रशिया एक्ट पर दस्तखत किया, जिसका उद्देश्य रूस से तेल, गैस और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाना है,
‘मॉस्को को संसाधनों से वंचित करने के बहाने’. इससे दरअसल भारत, चीन और ब्राजील को जबरदस्त नुकसान पहुंचाने की मंशा है. पर भारत ने झुकने से इनकार कर दिया है. नई दिल्ली के शांत और उत्तेजनाविहीन प्रतिरोध ने ट्रम्प की रणनीति का खोखलापन उजागर कर दिया है. ट्रम्प ने अमेरिकी शक्ति को जोर-जबरदस्ती समझ लिया,
और यह भूल गए कि आज ताकत दबाव बनाने से नहीं, साझेदारी बनाने से आती है. ट्रम्प द्वारा वैश्विक मंचों से अमेरिका को बाहर निकाल लेने से भी स्थिति बदतर हुई है. इसी महीने ट्रम्प ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस से अमेरिका के बाहर निकलने का आदेश जारी किया. यह भारत की बेहद महत्वाकांक्षी वैश्विक पहल थी,
जिसे इसने विकासशील देशों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 2015 में फ्रांस के साथ लॉन्च किया था. हालांकि अमेरिका के बाहर निकलने से इस परियोजना पर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा, और भारत ने जापान, यूरोपीय संघ तथा अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक से फंडिग लेकर भरपाई कर ली.
दो प्रतिद्वंद्वियों के प्रति ट्रम्प का अलग-अलग बर्ताव भी भारत के प्रति उनकी सनक को जाहिर करता है. उन्होंने लगातार यह झूठा दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष उन्होंने रोका. अपनी कूटनीतिक प्रतिभा का परिचय देने के लिए उन्होंने बार-बार अपना दावा दोहराया, जैसे कि भारत को उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.
इस बीच पाक सैन्य नेतृत्व से नजदीकी जता कर तथा ढाका को आर्थिक मदद देकर ट्रम्प ने भारत के क्षेत्रीय हितों के विपरीत जाने का संदेश दिया. चीन की तरफ झुक कर तथा भारत को निशाना बना कर ट्रम्प दरअसल उस रणनीतिक रिश्ते को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं, जो हिंद-प्रशांत में बीजिंग के विस्तारवाद पर अंकुश लगा सकता है.
यहीं पर सारे समीकरण अमेरिका के विपरीत जाते दिखते हैं. अपनी विराट आर्थिक शक्ति के बावजूद अमेरिका रणनीतिक खिंचाव और आबादी की स्थिरता की चुनौती से जूझ रहा है. दूसरी तरफ भारत के 1.4 अरब उपभोक्ताओं का विशाल बाजार वैश्विक नवाचार तथा विनिर्माण वृद्धि का विराट मंच उपलब्ध कराता है.
एप्पल, गूगल, एमेजॉन, टेस्ला- यानी तकनीक क्षेत्र की हर बड़ी अमेरिकी कंपनी अपने अस्तित्व के लिए भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, उपभोक्ताओं और प्रतिभाओं पर निर्भर है. भू-राजनीतिक वास्तविकता तो यह है कि भारत के बिना अमेरिका अपनी प्रतिस्पर्धात्मक श्रेष्ठता बरकार नहीं रख सकता. यदि ट्रम्प सचमुच अमेरिका को फिर से महान राष्ट्र बनाना चाहते हैं,
तो पहले उन्हें अमेरिका को बुद्धिमान बनाना होगा. उन्हें स्वीकार करना होगा कि 21 वीं सदी में सत्ता संतुलन उन देशों के साथ सहयोग पर निर्भर करेगा, जिनके पास लोकतांत्रिक मूल्य और जनसांख्यिकी की शक्ति है. और इस मामले में भारत से बेहतर साझेदार अमेरिका को नहीं मिलेगा.
अगर वाशिंगटन टकराव का रास्ता चुनता है तो वह उस ताकत से हाथ धो बैठेगा, जो चीन को नियंत्रण में रखने और एशिया की स्थिरता बहाल करने में सर्वाधिक सक्षम है. इसके बजाय अगर वह भारत के साथ सहयोग का रास्ता चुनता है तो उसके पास वैश्विक प्रासंगिकता और नैतिक नेतृत्व को नया रूप देने का अवसर होगा.
निर्णय ट्रम्प को लेना है, जबकि उसका असर अमेरिका पर पड़ेगा. इसकी वजह यह है कि 2026 में एक सत्य किसी भी शब्दाडंबर से बड़ा है, और वह यह कि भारत को अमेरिका की जितनी जरूरत है, अमेरिका को भारत की आवश्यकता उससे ज्यादा है. वाशिंगटन जितनी जल्दी यह सच्चाई समझे, एक टिकाऊ विश्व व्यवस्था में इन दोनों देशों द्वारा अपनी भूमिकाएं निभाने में उतनी ही सहूलियत होगी.