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ममता बनर्जी अकेले कैसे मोदी-शाह पर पड़ीं भारी, ये हैं इसके पांच बड़े कारण

By संदीप दाहिमा | Updated: May 2, 2021 16:43 IST

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देश में कोरोना संकट के बावजूद केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में जीतने के लिए इस्तेमाल की थी। इसलिए, यह दावा किया गया था कि बंगाल में चुनावों में भाजपा कड़ी टक्कर देगी। लेकिन वास्तव में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने परिणामों में आगे निकल रही है। वहीं भाजपा 80-90 सीटों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली मजबूत बीजेपी अकेले ममता बनर्जी पर हावी होती दिख रही थी। विशेषज्ञों का कहना है कि ममता बनर्जी का आक्रामक चेहरा और बंगाली पहचान उनके लिए फायदेमंद साबित हुई।
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केंद्र में सत्ता में रही भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी सारी मशीनरी तैनात कर दी थी। हालांकि, बंगाली लोगों ने महसूस किया कि ममता बनर्जी नंदीग्राम में अभियान के दौरान घायल हो गई थीं और फिर उन्होंने व्हीलचेयर में आक्रामक तरीके से अभियान शुरू किया। इसलिए ममता बनर्जी को बहुत सहानुभूति मिली।
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बंगाल में जीतने के लिए भाजपा ने ध्रुवीकरण पर भरोसा किया। लेकिन जवाब में, तृणमूल ने ममता को बंगाल की बेटी के रूप में आगे बढ़ाया। इसलिए महिला मतदाताओं ने तृणमूल का रुख किया। बंगाल में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं था। इसके अलावा, कोई आक्रामक महिला नेता नहीं थीं, इसलिए भाजपा ममता को अपने अंदाज में जवाब देने में सक्षम नहीं थी। ममता बनर्जी अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों को अपने साथ रखने में भी सफल रहीं। भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया। इसके अलावा, तृणमूल ने ममता बनर्जी पर हुए हमलों को भाजपा के बाहर के नेताओं द्वारा बंगाली संस्कृति, बंगाली भाषा और बंगाली पहचान के साथ जोड़ा।
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भाजपा ने पिछड़े वर्गों और आदिवासियों को एक साथ लाकर हिंदू समुदाय को एकजुट करने का प्रयास किया। लेकिन भाजपा प्रभावशाली मतुआ समुदाय को लुभाने में सफल नहीं रही है। तृणमूल ने राजवंश और अन्य समुदायों पर भी बड़ी पकड़ बनाए रखी।
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भाजपा ने बंगाल में 70-30 ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई। लेकिन तृणमूल नेताओं और ममता बनर्जी ने सावधानीपूर्वक और आक्रामक रूप से दावा किया कि भाजपा हर बैठक में बंगाल को विभाजित करने की कोशिश कर रही थी। ममता बनर्जी की रणनीति मस्जिदों के साथ-साथ मंदिरों में भी जाने की थी। इसलिए, भाजपा विरोधी मतदाताओं ने तृणमूल कांग्रेस का रुख किया।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने ममता बनर्जी के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया। ममता पर दिए गए कई बयानों की वजह से कई राज्यों में ममता बनर्जी को सहानुभूति जीतने का काम किया। इन बयानों से मतदाताओं में अच्छा संदेश नहीं गया। इससे तृणमूल कांग्रेस को बड़ी जीत मिली।
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