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वीरगति पार्ट-4: अरुण खेत्रपाल, वो जवान जिसे मार कर पाकिस्तानी ब्रिगेडियर आत्मग्लानि से भर गया

By भारती द्विवेदी | Updated: July 19, 2018 11:33 IST

21 साल की उस भारतीय जवान को मारने वाला पाकिस्तानी ऑफिसर उसे मारने के बाद ये सोच रहा था कि काश वो उसे बचा पाता। जिसके बहादुरी के किस्से आपको पाकिस्तानी वेबसाइट पर भी मिल जाएंगे।

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71 की लड़ाई के बाद रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल के पास पाकिस्तान के एक बिग्रेडियर का संदेश आता है। संदेश भेजने वाला पाकिस्तानी ब्रिगेडियर चाहता था कि एमएल खेत्रपाल उसके घर आएं और रुके। आखिरकार एमएल खेत्रपाल ने पाकिस्तान जाकर अपनी जन्म भूमि सरगोधा देखने का मन बनाया। पाकिस्तान पहुंचने पर ब्रिगेडियर नसीर ने उनकी जमकर खिदमत की। नसीर की तरफ से मिली इज्जत और प्यार को देखकर एमएल खेत्रपाल बेहद खुश थे। भारत लौटने के एक दिन पहले ब्रिगेडियर नसीर ने उनसे कहा कि वो उन्होंने कुछ बताना चाहते हैं। 

फिर नसीर ने बोलना शुरू किया-  'मैं जो आपको बताने जा रहा हूं। उसका संबंध आपके बेटे से है। 16 दिसम्बर 1971 की सुबह आपका बेटा और मैं अपने-अपने देश के लिए आमने सामने थे। मैं बहुत दुख के साथ आपको ये बता रहा हूं कि आपका बेटा मेरे हाथों ही मारा गया था। लड़ाई के मैदान पर उसकी हिम्मत देखने लायक थी। हम दोनों ने एक-दूसरे पर निशाना साधा था लेकिन मेरा भाग्य था जो मैं बच गया और अरुण मारा गया। मैं आपके बेटे को सैल्यूट करता हूं।'

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सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र जीतने का गौरव मिला

1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में इतिहास के पन्नों में बहुत कुछ दर्ज हुआ। इतिहास के पन्नों में एक नाम भी दर्ज हुआ। 21 साल का एक लड़का जिसने उस लड़ाई में पाकिस्तानियों के चार बंकर उड़ाए थे। जिसकी बहादुरी की दाद पाकिस्तानी भी देते हैं। 21 साल की उस भारतीय जवान को मारने वाला पाकिस्तानी ऑफिसर उसे मारने के बाद ये सोच रहा था कि काश वो उसे बचा पाता। जिसके बहादुरी के किस्से आपको पाकिस्तानी वेबसाइट पर भी मिल जाएंगे। 21 साल के उस लड़के का नाम था अरुण खेत्रपाल। जिन्होंने सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र जितने का गौरव हासिल किया।

खेत्रपाल का जन्म जन्म 14 अक्तूबर 1950 को पूना के फौजी फैमिली में हुआ था। क्योंकि उनके पिता मदन लाल खेत्रपाल ब्रिगेडियर थे, जिसकी वजह उनकी शुरुआती शिक्षा देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई थी। एनडीए (NDA) के दौरान वह 'स्क्वेड्रन कैडेट' के रूप में चुने गए। इण्डियन मिलिट्री अकेडमी देहरादून में वह सीनियर अण्डर ऑफिसर बनाए। 13 जून 1971 को उनका चयन पूना हॉर्स में बतौर सेकेंड लेफ्टिनेंटहुआ था।

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अरुण खेत्रपाल, जिसके लिए भारतीय सेना ने अपने नियम बदले

अरुण खेत्रपाल जिस वक्त भारतीय सेना में शमिल हुए। उस वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच 71 की लड़ाई की भूमिका तैयार हो रही थी। खेत्रपाल उस समय अहमदनगर में यंग ऑफिसर्स का कोर्स  कर रहे थे। लड़ाई का अंदेशा होते ही यंग ऑफिसरों को कोर्स के बीच से बुलाकर रेजिमेंट भेजने का फैसला किया गया था। खेत्रपाल जब मोर्च पर पहुंचे तो कमांडर हनूत सिंह उन्हें लड़ाई में शामिल करने से मना कर दिया। क्योंकि उन्होंने अपना कोर्स पूरा नहीं किया था। लेकिन खेत्रपाल ने कोशिश करके कमांडर हनुत सिंह को मना लिया। जिसके बाद उन्हें युद्ध में जाने की इजाजत मिल गई थी।

भारत पाकिस्तान के बीच 71 की लड़ाई ईस्ट पाकिस्तान यानी का आज के बांग्लादेश में हो रही थी। लेकिन पाकिस्तान लगातार पश्चिम में यानी बल्ज इलाके में हमला कर रहा था। बल्ज में हमला कर पाकिस्तान जम्मू कश्मीर को देश से अलग करना चाहता था। बल्ज एक ऐसा इलाका है, जहां से सीधे पाकिस्तान के सेंटर में घुसा जा सकता है। पाकिस्तान इस इलाके को पिंड कहता है और भारत बसंतर। 

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जब अकेले पाकिस्तानी आर्मर ब्रिगेड की धज्जियां उड़ाई 

16 दिसंबर को बड़े हमले के इरादे से बसंतर नदी पर पाकिस्तानी टैंक जमा हो रहे थे। पाकिस्तानी टैंक का सामना करने के लिए पूना हार्स की विशाल टैंक आगे बढ़ रहे थे। पूना हॉर्स को चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए पाकिस्तान ने पूरा आर्मर ब्रिगेड उतार दिया। आपको बता दें कि एक आर्मर ब्रिगेड में लगभग 150 सौ टैंक होती हैं। पाकिस्तान की तरफ से हुए हमले में लेंफ्टिनेंट अहलावत घायल हुए। वहीं के मल्होत्रा के टैंक की बंदूक खराब हो गई थी। अब मोर्चे पर अकेले अरूण खेत्रपाल थे। उनका सामना पाकिस्तान की चार टैंकों से था। हमले के दौरान पाकिस्तानी टैंक से निकाला गोला खेत्रपाल की टैंक से टकराया और वो आगे की लपटों में घिर गए।

लेकिन टैंक को पीछे लेने के बजाए उन्होंने आगे बढ़ने का फैसला किया। हालात देखते हुए कैप्टन मल्होत्रा ने उन्हें रेडियो पर संदेश देना शुरू किया कि अरुण तुम टैंक से बाहर निकालो। लौट आओ। लेकिन अरूण ने कहा- 'सर मेरी बंदूक अभी भी काम कर रही हैं।' ये कहकर खेत्रपाल ने जानबूझकर रेडियो बंद कर दिया। अरुण ने बहादुरी से लड़ते हुए पाकिस्तान के चार टैंक बर्बाद किए। जिसे आखिर टैंक पर उन्होंने निशान लगया वो पाकिस्तान के स्कवार्डन कमांडर का नसीर का टैंक था। उनकके हमले से टैंक तो तबाह हो गया लेकिन कमांडर नसीर ने टैंक से कूदकर अपनी जान बचा ली। वहीं खेत्रपाल अपनी टैंक से बाहर निकलने में असफल रहे और देश के लिए शहीद हो गए।

छोटी उम्र में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले अरुण की कहानी: 

नोट: लोकमतन्यूज़ अपने पाठकों के लिए एक खास सीरीज़ कर रहा है 'वीरगति'। इस सीरीज के तहत हम अपने पाठकों को रूबरू करायेंगे भारत के ऐसे वीर योद्धाओं से जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की।

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