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क्षमा-करुणा ही बुद्ध की वास्तविक ताकत, शांति, सह-अस्तित्व और करुणा विषय पर विचार गोष्ठी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 4, 2026 12:12 IST

बौद्ध चिंतन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अत्यंत निकट है, जो व्यक्ति में स्वतंत्र सोच, प्रश्न करने की क्षमता और तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रवृत्ति विकसित करता है।डॉ. सिंह ने आगे कहा कि बौद्ध साहित्य केवल धार्मिक ग्रंथों का संकलन नहीं।

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ठळक मुद्दे संवेदनशील एवं समतामूलक समाज का निर्माण संभव है।बुद्धिज्म हमें अंधविश्वास नहीं, बल्कि तर्क करना सिखाता है।

मथुराः जनवादी लेखक संघ एवं भारतीय बौद्ध महासभा के  तत्वावधान में “बौद्ध साहित्य में शांति, सह-अस्तित्व और करुणा” विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन डॉ. भीमराव अंबेडकर सभा स्थल कृष्णा नगर में किया गया। कार्यक्रम में विद्वानों, साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, जनवादी लेखक संघ के महासचिव एवं जयनारायण पीजी कॉलेज, लखनऊ के प्रोफेसर डॉ. नलिन रंजन सिंह ने अपने विस्तृत उद्बोधन में कहा कि क्षमा एवं करुणा ही बुद्ध की वास्तविक ताकत है और यही वह आधार है जिस पर एक संवेदनशील एवं समतामूलक समाज का निर्माण संभव है।

उन्होंने कहा कि आज जब विश्व असहिष्णुता, हिंसा और वैचारिक कट्टरता के दौर से गुजर रहा है, तब गौतम बुद्ध के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। डॉ. सिंह ने कहा कि दुनिया से सभ्यता और संस्कृति भले ही समय के साथ क्षीण हो जाएं, किंतु बुद्ध के विचार कभी नष्ट नहीं हो सकते, क्योंकि वे मानवीय चेतना के मूल में बसे हुए हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अहिंसा के क्षेत्र में बुद्ध से बड़ा दाता कोई नहीं है, उनकी अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा का विरोध नहीं, बल्कि विचारों, वाणी और व्यवहार में भी सौम्यता और सहिष्णुता का आग्रह करती है, उन्होंने बौद्ध दर्शन की वैज्ञानिकता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बुद्धिज्म हमें अंधविश्वास नहीं, बल्कि तर्क करना सिखाता है।

यह हमें हर बात को विवेक और अनुभव की कसौटी पर परखने की प्रेरणा देता है। इसी कारण बौद्ध चिंतन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अत्यंत निकट है, जो व्यक्ति में स्वतंत्र सोच, प्रश्न करने की क्षमता और तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रवृत्ति विकसित करता है।डॉ. सिंह ने आगे कहा कि बौद्ध साहित्य केवल धार्मिक ग्रंथों का संकलन नहीं,

बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाने की एक जीवंत प्रक्रिया है, जो हमें करुणा, मैत्री और सह-अस्तित्व के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने आह्वान किया कि यदि हम वास्तव में एक शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं, तो बुद्ध के विचारों को केवल पढ़ने तक सीमित न रखकर उन्हें अपने व्यवहार में उतारना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एड. बद्रीप्रसाद सिंह (पूर्व डीजीसी सिविल एवं संरक्षक, भारतीय बौद्ध महासभा, मथुरा) ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि बुद्ध के विचार केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के मार्गदर्शक हैं, उन्होंने समाज में शांति, समानता और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए बुद्ध के सिद्धांतों को अपनाने पर बल दिया।

इस अवसर पर विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. धर्मराज सिंह ने बौद्ध साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के विखंडित सामाजिक परिवेश में सह-अस्तित्व और करुणा की स्थापना ही मानवता को बचा सकती है। साहित्यिक प्रस्तुति के अंतर्गत सुनील कुमार कर्दम एवं लाखन लाल हलचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समकालीन समाज और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया, जिसे उपस्थित श्रोताओं ने सराहा। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अनिल दिनकर द्वारा किया गया।

अंत में जनवादी लेखक संघ, मथुरा के अध्यक्ष टिकेंद्र सिंह ‘शाद’ ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया, कार्यक्रम में जन सांस्कृतिक मंच के अध्यक्ष राजकिशोर, सुनील आचार्य, मुरारीलाल, डॉ सोहनलाल शीतल, ताराचंद गौतम, प्रह्लाद सिंह, यजवीर सिंह विद्रोही, केपी सिंह एड, विवेकदत्त मथुरिया, प्रसून पाण्डेय, डॉ कैलाश चंद, राजेंद्र सिंह, धर्मदेव, अर्पित जादोन, हरिसिंह, अमर सिंह आदि उपस्थित रहे।

टॅग्स :उत्तर प्रदेशमथुरा
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