अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ब्रिटिश नरेश चार्ल्स के बीच हाल ही में हुई एक चुटीली चर्चा ने संघर्षों से भरी दुनिया का ध्यान खींचा है. चार्ल्स ने अपनी बात तो कही मजाक में, लेकिन उसे ट्रम्प के बड़बोलेपन का जवाब माना जा रहा है. 28 अप्रैल को ह्वाइट हाउस की डिनर पार्टी में चार्ल्स ने ट्रम्प से कहा कि अगर ब्रिटेन नहीं होता तो अमेरिकी फ्रेंच बोल रहे होते.
चार्ल्स ने एक तरह से ट्रम्प के उस बयान का जवाब दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर अमेरिका नहीं होता तो आज यूरोप जर्मन बोल रहा होता. ईरान युद्ध में ट्रम्प की अपील के बावजूद यूरोप ने उनका साथ नहीं दिया, इससे ट्रम्प चिढ़े हुए थे. उन्होंने एक तरह से दूसरे विश्वयुद्ध की याद दिलाई, जब जर्मन तानाशाह हिटलर ने यूरोप पर कब्जा शुरू कर दिया था,
तब जर्मनी और जापान की सेनाओं को हराने के पीछे अमेरिकी कार्रवाई की बड़ी भूमिका रही. अंग्रेजी की नाभिनाल ब्रिटेन से जुड़ी है. लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय संपर्क के तौर पर देखें तो वही दुनिया के संवाद का जरिया बनी हुई है. चार्ल्स ने ठीक ही कहा कि अमेरिका पर वर्चस्व की लड़ाई में अगर फ्रांस को जीत मिलती तो अमेरिका में अंग्रेजी राज नहीं कर रही होती.
निश्चित तौर पर तब फ्रेंच भाषा का वर्चस्व होता. अमेरिका पर कब्जे को लेकर 1756 से 63 के बीच ब्रिटेन और फ्रांस के बीच युद्ध चला, जिसमें फ्रांस की पराजय हुई और वहां ब्रिटेन का कब्जा हो गया. अमेरिका ब्रिटिश ताज से अलग भले ही हुआ, लेकिन वह आज भी ब्रिटेन की परंपराओं और भाषा को संजोए हुए है.
अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से विकसित भाषाओं के अलावा अगर कोई देश या इलाका दूसरी भाषा का प्रयोग करता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भाषा उसे बहुत प्यारी है. बल्कि वह अपने अस्तित्व और शासन व्यवस्था से समायोजन के लिए उस भाषा में पारंगत होना चाहता है. पहली पीढ़ी तक तो यही कारण होते हैं, बाद की पीढ़ियों के लिए यह आदत में शुमार हो जाता है.
आज भारत में एक वर्ग ऐसा है, जिसे इन ऐतिहासिक संयोगों और विकासक्रम से कुछ लेना-देना नहीं है. लेकिन वे अंग्रेजी से बेइंतहा प्यार करते हैं. क्या उनका यह प्यार अंग्रेजी के लिए वैसा ही रहता, अगर 1749 से 1754 के बीच चले दूसरे कर्नाटक युद्ध में ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव की बजाय फ्रांसीसी डुप्ले को जीत मिली होती?
भूमंडलीकरण के दौर में किसी विदेशी भाषा को त्याज्य नहीं बनाया जा सकता, उनसे दुश्मनी की बात सोचना भी बेमानी है. पर अपनी भाषाओं से प्यार होना ही चाहिए. ऐतिहासिक संयोगों के साथ विकसित भाषा की कीमत पर अपनों से बैर का कोई तुक नहीं. बेहतर होगा कि हम सब इसे उसी तरह समझें,
जैसे चार्ल्स ने ट्रम्प को दिए चुटीले जवाब के जरिए अमेरिका को समझाने की कोशिश की है. चार्ल्स का मजाक भाषाओं के नाम पर लड़ती दुनिया के लिए मानीखेज संदेश है कि हर भाषा के साथ संयोग जुड़े होते हैं और इतिहास भी. इस इतिहास को भी लोग समझें और संयोग को भी. लोग यह भी सोचें कि आखिर भाषाओं के नाम पर संघर्ष की जरूरत ही क्या है?