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खून-खराबे में कोहिनूर क्यों याद आया?

By विजय दर्डा | Updated: May 4, 2026 05:15 IST

यात्रा से ठीक पहले एक पत्रकार वार्ता में ममदानी से पूछा गया कि किंग की न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान यदि उन्हें किंग से मिलने का मौका मिला तो वे उनसे क्या कहेंगे?

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ठळक मुद्देअप्रैल के अंतिम सप्ताह में ब्रिटेन के किंग चार्ल्स चार दिनों की अमेरिका यात्रा पर पहुंचे.मुझे राजा से बात करने का मौका मिला, तो शायद मैं उन्हें कोहिनूर हीरा लौटाने के लिए कहूंगा.ममदानी से किंग की मुलाकात हुई थी. उन्होंने हाथ मिलाए और एक-दूसरे का अभिवादन किया.

कोई वक्त खुद को कभी खूनी नहीं बनाता बल्कि वक्त की गोद में पलने वाला इंसान उसे खूनी बना देता है. वक्त का ये दौर भी ऐसा ही है. मगर जरा सोचिए कि ऐसे खूनी वक्त में दुनिया के बेमिसाल शहर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी को दुनिया के सबसे नायाब हीरे कोहिनूर की याद आए और उसे भारत पहुंचाने की तमन्ना भी जागे तो क्या यह अचंभित कर देने वाली बात नहीं है? पहले मैं भी अचंभित हुआ था लेकिन खयाल आया कि शब्दों के पीछे भी राजनीति होती है. कहीं यह मामला वाकई ऐसा ही तो नहीं है? अप्रैल के अंतिम सप्ताह में ब्रिटेन के किंग चार्ल्स चार दिनों की अमेरिका यात्रा पर पहुंचे.

उनकी यात्रा से ठीक पहले एक पत्रकार वार्ता में ममदानी से पूछा गया कि किंग की न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान यदि उन्हें किंग से मिलने का मौका मिला तो वे उनसे क्या कहेंगे? ममदानी ने जो जवाब दिया वह अगले कुछ मिनटों में ही पूरी दुनिया में वायरल हो गया. उन्होंने कहा- अगर मुझे राजा से बात करने का मौका मिला, तो शायद मैं उन्हें कोहिनूर हीरा लौटाने के लिए कहूंगा.

29 अप्रैल को जब किंग चार्ल्स और रानी कैमिला ने 9/11 मेमोरियल और म्यूजियम का दौरा किया और 2001 के आतंकी हमलों में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के साथ पीड़ितों के परिवारों से मुलाकात की तो कुछ देर के लिए ममदानी से किंग की मुलाकात हुई थी. उन्होंने हाथ मिलाए और एक-दूसरे का अभिवादन किया.

लेकिन यह पता नहीं चल पाया कि क्या उस मुलाकात में किंग के सामने ममदानी ने कोहिनूर का मुद्दा उठाया? भले ही किंग के सामने वे मुद्दा नहीं उठा पाए हों लेकिन मीडिया के सामने कोहिनूर का मसला उठा कर  ममदानी ने ब्रिटेन के औपनिवेशिक इतिहास को तो छेड़ ही दिया है. इस नायाब हीरे को वापस लेने के लिए भारत लगातार मांग करता रहा है.

अब कोई यह नहीं कह सकता कि न्यूयॉर्क के मेयर का कोहिनूर से क्या लेना-देना क्योंकि ममदानी भारतीय मूल के हैं और इस नाते कोहिनूर पर राय व्यक्त करना उनका हक बनता है. मगर बात केवल इतनी सी नहीं है. ममदानी ने किंग को कोहिनूर पर राय देने की मंशा जता कर अपने कद को भी बड़ा किया है.

हालांकि ममदानी न केवल ट्रम्प बल्कि कई बार भारत की भी कठोर आलोचना करते रहे हैं लेकिन कोहिनूर के माध्यम से उन्होंने भारतीय जनमानस और अमेरिका में बसे भारतीयों को अपने करीब लाने का प्रयास किया है. ब्रिटेन के राजा की अमेरिका यात्रा के दौरान कोहिनूर की बात करना कोई कम हिम्मत का काम नहीं है. इसके लिए जिगर चाहिए!

कोहिनूर पर जब मैं ममदानी के बयान सुन रहा था तब मुझे अचानक ऑक्सफोर्ड यूनियन में शशि थरूर का वो धुआंधार भाषण याद आ गया जिसमें उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों को लूट कर अपना घर भरा. थरूर ने प्रमाण के साथ बताया कि जब ब्रिटिश भारत आए तब वैश्विक जीडीपी में भारतीय हिस्सेदारी 23 से 27 फीसदी के बीच थी,

लेकिन जब वे गए तो हिस्सेदारी तीन फीसदी से भी कम रह गई. ब्रिटेन का औद्योगिक विकास वास्तव में भारत के संसाधनों को लूट कर हुआ. भारतीय कपड़ा उद्योग को केवल इसलिए बर्बाद किया गया ताकि ब्रिटेन को बाजार मिल सके. थरूर ने तो यहां तक कहा कि ब्रिटेन को औपनिवेशिक काल के अत्याचारों, लूट और हत्याओं के लिए भारत से माफी मांगनी चाहिए.

जाहिर सी बात है कि ब्रिटेन की लूट का ही नतीजा है कि कोहिनूर आज भारत के पास नहीं बल्कि ब्रिटेन के पास है. इसकी कीमत का केवल अंदाजा भर लगाया जा सकता है. विशेषज्ञों की राय है कि मौजूदा दौर में कोहिनूर की कीमत एक अरब डॉलर से भी ज्यादा होगी. मगर इसकी कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि कोहिनूर भारत का गौरव है.

कोहिनूर का अर्थ होता है रोशनी का पहाड़. भारत से ब्रिटेन तक के इसके सफर की कहानी भी बड़ी खूनी दास्तानों में लिपटी हुई है. इतिहासकारों का मानना है कि यह 13वीं-14वीं शताब्दी के बीच आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले की गोलकुंडा खदानों से निकला था. गोलकुंडा का हीरा आज भी दुनिया भर में बेमिसाल माना जाता है. उस वक्त कोहिनूर करीब-करीब 793 कैरेट का था.

कई बार तराशे जाने के बाद अब यह 105.6 कैरेट का है. खुदाई के बाद यह काकतीय राजवंश के पास आ गया. इतने बड़े हीरे की ख्याति फैलना लाजमी था. 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने जब दक्षिण भारत पर हमला किया तो उसे कोहिनूर की तलाश थी. उसे सफलता भी मिल गई और कोहिनूर अलाउद्दीन खिलजी के पास दिल्ली पहुंच गया.

1526 में पानीपत की पहली लड़ाई के बाद यह बाबर के पास पहुंचा. बाबर के परपोते शाहजहां ने तो इसे अपने सिंहासन तख्त-ए-ताऊस में जड़वाया था.  1739 में नादिर शाह ने दिल्ली को जब लूटा तब वह कोहिनूर को फारस (वर्तमान ईरान) ले गया. उसी ने इसे कोहिनूर नाम दिया. नादिर शाह के बाद यह नायाब हीरा अहमद शाह अब्दाली और उसके वंशजों के पास रहा.

इतिहास बताता है कि 1813 में इस हीरे को वापस पाने में महाराजा रणजीत सिंह कामयाब रहे लेकिन इस पर तो ब्रिटिश साम्राज्य की बुरी नजर लग चुकी थी. रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके पुत्र दलीप सिंह केवल पांच साल की उम्र में महाराजा बने. 1849 में जब अंग्रेजों ने पंजाब को ब्रिटिश शासन के अधीन कर लिया तो एक समझौते के तहत कोहिनूर ले लिया.

इस तरह कोहिनूर लंदन चला गया. अब ब्रिटेन कहता है  कि यह हीरा एक कानूनी संधि के तहत हासिल किया गया है. सवाल यह है कि केवल दस साल की उम्र के एक बच्चा राजा को डरा-धमका कर की गई संधि को संधि कहा जाए या फिर कपट? दुनिया इसे कपट ही मानती है.

मैंने टावर ऑफ लंदन में कोहिनूर को देखा है. वो अपना सा लगता है. क्या हम उसे कभी भारत में देख पाएंगे? इतिहास गवाह है कि कोहिनूर अपना ठिकाना बदलता रहा है. वक्त का क्या ठिकाना? शायद कभी अपने घर लौट आए और भारत के मुकुट में जड़ जाए!

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