पटनाः मकर संक्रांति के मौके पर बिहार का सियासी पारा ‘दही-चूड़ा भोज’ के बहाने गर्म रहा। इस बार राज्य की सियासत में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। सालों से जिस 10 सर्कुलर रोड (राबड़ी आवास) को दही-चूड़ा भोज का मुख्य केंद्र माना जाता था, वहां इस बार सन्नाटा पसरा रहा। इसके उलट, लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव इस परंपरा की कमान संभालते हुए एक भव्य आयोजन कर विभिन्न दलों के नेताओं का जमावडा देखा गया। दरअसल, बिहार की सियासत में मकर संक्रांति को सियासी संक्रांति के तौर पर जाना जाता है।
हर साल मकर संक्रांति पर कोई न कोई सियासी खेल जरूर होता है। दही-चूड़ा भोज के जरिए गठबंधन बनते और बिगड़ते हैं। समय बितने के साथ वह खेल भी उजागर हो जाता है। अब इस मकर संक्रांति का कौन सा साइड इफेक्ट सामने आने वाला है वह तो समय बितने के साथ ही सामने दिखेगा। फिलहाल बिहार की सियासत में दही-चूड़ा भोज की राजनीति जारी है।
एक तरफ जहां जदयू विधायक रत्नेश सादा के आवास पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया गया तो वहीं भाजपा की ओर से पार्टी कार्यालय में भी दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया गया। जिसमें दोनों उपमुख्यमंत्री समेत पार्टी के तमाम बड़े नेता शामिल हुए। उधर, लालू यादव के बड़े बेटे और जनशक्ति जनता दल(जजद) प्रमुख तेज प्रताप यादव ने भी दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया था।
तेज प्रताप यादव के भोज में राजद प्रमुख लालू यादव, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान सहित कई मंत्री सहित दिग्गज नेता पहुंचे। तेज प्रताप यादव ने खुद राबड़ी आवास जाकर उन्हें और तेजस्वी यादव समेत राबड़ी देवी को निमंत्रण दिया था। तब इस भोज में लालू यादव के जाने पर संशय जरूर था, लेकिन सारा संशय दूर हो गया।
सात महीने की लंबी तल्खी के बाद तेज प्रताप यादव खुद राबड़ी आवास पहुंचे थे और तेजस्वी यादव सहित पूरे परिवार को निमंत्रण दिया था। यही नहीं तेज प्रताप ने सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष और परिवार तक को न्योता देकर सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है। यह भोज सिर्फ़ स्वाद का नहीं, संकेतों का भी है।
बता दें कि मंगलवार को उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के आवास पर हुए दही-चूड़ा भोज में तेज प्रताप यादव की मौजूदगी पहले ही सियासी बहस को तेज कर चुकी है। विजय सिन्हा ने साफ कहा कि मकर संक्रांति पर हर साल सभी नेताओं को न्योता दिया जाता है। तेज प्रताप को भी बुलाया गया था और अब उन्होंने भी अपने भोज में आमंत्रित किया।
यह आपसी न्योते सियासत में शिष्टाचार से आगे बढ़कर नए दरवाजे खोलते दिख रहे हैं। तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्होंने उन नेताओं को भी न्योता दिया था, जिनकी राजनीति सीधे तौर पर राजद की विचारधारा के खिलाफ मानी जाती है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 2025 विधानसभा चुनाव से पहले तेज प्रताप अपनी एक अलग और समावेशी राजनीतिक छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। उधर, दूसरी ओर, एनडीए खेमे में भी मकर संक्रांति की धूम दिखी। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी अपने आवास पर 15 जनवरी को दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया है।
जबकि 16 जनवरी को भाजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के आवास पर भोज यानी दही-चूड़ा की थाली परोसी जाएगी। बता दें कि बिहार की राजनीति में यह दही-चूड़ा महज एक पारंपरिक पकवान नहीं, बल्कि आने वाले समय में बनने और बिगड़ने वाले गठबंधनों का लिटमस टेस्ट साबित होने वाला है।
उल्लेखनीय है कि मकर संक्रांति की परंपरा बिहार की राजनीति में ताकत दिखाने और मौजूदगी दर्ज कराने का जरिया बन चुकी है। हर साल दही-चूड़ा भोज के बहाने होने वाली मुलाकातें इस बार सिर्फ़ रस्म अदायगी नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश और संभावित समीकरणों का इशारा बन गई हैं।