लाइव न्यूज़ :

वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग : काबुल से अमेरिका की वापसी

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: September 1, 2021 10:04 IST

अमेरिका की तालिबान से सांठगांठ नहीं होती तो काबुल छोड़ते वक्त हजारों अमेरिकी मारे जाते

Open in App
ठळक मुद्देअमेरिका की तालिबान से सांठगांठ नहीं होती तो काबुल छोड़ते वक्त हजारों अमेरिकी मारे जातेलगभग 20 साल बाद अमेरिका अफगानिस्तान से लौट रहा हैकाबुल हवाई अड्डे पर 13 अमेरिकी इसलिए मारे गए

लगभग 20 साल बाद अमेरिका अफगानिस्तान से लौट रहा है. विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र आज किस मुद्रा में है? गालिब के शब्दों में ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले.’अमेरिका की तालिबान से सांठगांठ नहीं होती तो काबुल छोड़ते वक्त हजारों अमेरिकी मारे जाते.

अब तालिबान का ताजा बयान है कि काबुल हवाई अड्डे पर 13 अमेरिकी इसलिए मारे गए क्योंकि वे विदेशी थे और विदेशी फौज की वापसी के बाद खुरासान गिरोह इस तरह के हमले क्यों करेगा? 

यदि ऐसा हो जाए तो क्या बात है. लेकि मुझे नहीं लगता कि अब अमेरिकियों के चले जाने के बावजूद इस तरह के हमले बंद हो जाएंगे. अल-कायदा या खुरासान गिरोह और तालिबान के बीच सैद्धांतिक मतभेद तो हैं ही, सत्ता की लड़ाई भी है. 

खुरासान गिरोह के लोग अमेरिकियों के साथ तालिबान की सांठगांठ के धुर विरोधी रहे हैं. वे काबुल से तालिबान को भगाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देंगे. तालिबान सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित है लेकिन खुरासानी गिरोह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और म्यांमार तक पैर फैलाना चाहता है. 

वह पाकिस्तान से भी काफी खफा है. वे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की तरह इस्लामाबाद को भी अपना शत्नु समझते हैं. वे तालिबान को भी काबुल में चैन से क्यों बैठने देंगे? 

तालिबान ने फिलहाल शिनजियांग के चीनी उइगर मुसलमानों से हाथ धो लिये हैं, कश्मीर को भारत का आंतरिक मुद्दा बता दिया है और मध्य एशिया के मुस्लिम गणतंत्नों में इस्लामी तत्वों के दमन से भी हाथ धो लिए हैं. इसीलिए अब तालिबान और खुरासानियों में जमकर ठनने की आशंका है. 

इसके अलावा तालिबान भी कई गिरोहों (शूरा) में बंटे हुए हैं. वे आपस में भिड़ सकते हैं. यह भिड़ंत अफगानिस्तान की संकटग्रस्त आर्थिक स्थिति को भयावह बना सकती है. हथियारों का जो जखीरा अमेरिकी अपने पीछे छोड़ गए हैं, वह कई नए हिंसक गुट पैदा कर देगा. 

अमेरिका तो इसी से खुश है कि अफगानिस्तान से उसका पिंड छूट गया. वह लगभग इसी तरह कोरिया, वियतनाम, लेबनान, लीबिया, इराक, सोमालिया आदि देशों को अधर में लटकता छोड़कर भागा है. 

भारत अभी अमेरिका के साथ है लेकिन उसे उसकी पुरानी हरकतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने में जो भूमिका भारत और पाकिस्तान मिलकर अदा कर सकते हैं, वह कोई नहीं कर सकता.

टॅग्स :अफगानिस्तानUSAKabul
Open in App

संबंधित खबरें

विश्वPM मोदी और ट्रंप के बीच 40 मिनट तक फ़ोन पर बातचीत हुई, होर्मुज़ की नाकेबंदी के मुद्दे पर हुई चर्चा

विश्वअमेरिका को इतनी क्यों जंग पसंद है?, 250 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो...

बॉलीवुड चुस्कीपाकिस्तान में US-ईरान बातचीत के बाद, नेटिज़न्स ने पूछा, ‘होटल का बिल कौन भरेगा?’ परेश रावल ने दिया मजेदार जवाब

विश्वIRGC ने ट्रंप के नौसैनिक नाकाबंदी के आदेश के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर पूर्ण नियंत्रण का दावा किया, विरोधियों को दी चेतावनी

विश्वइस्लामाबाद वार्ता क्यों विफल रही? ईरान के स्पीकर ग़ालिबफ़ ने एक-एक बिंदु पर विस्तार से बताया

विश्व अधिक खबरें

विश्वहाथ मिलाया, गले मिले: पाक आर्मी चीफ आसिम मुनीर पहुंचे ईरान, जानें क्यों खास है यह दौरा

विश्वIsrael-Hezbollah War: हिजबुल्लाह का भीषण प्रहार, 24 घंटों में इजरायली ठिकानों पर 39 बार किया हमला

विश्ववीआईपी कल्चर के खिलाफ नेपाल की पहल?, मंत्रियों की कारों के काफिले नहीं चलेंगे?

विश्वहोर्मुज स्ट्रेट हमेशा के लिए खोल रहा हूं, चीन बहुत खुश?, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा-शी मुझे गले लगाएंगे, ईरान को हथियार न देने पर सहमत

विश्वतो ईरान को दोबारा खड़े होने में 20 साल लगेंगे?, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा-यदि वह अभी पीछे हट जाएं तो...