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पुरानी योजनाओं को अधूरा छोड़ क्यों बनाई जाती हैं नई-नई योजनाएं ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: February 20, 2026 07:07 IST

शहरी योजनाकारों द्वारा शहरी खुले मैदानों व बड़े बगीचों के महत्व को न समझना अक्षम्य है.

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अभिलाष खांडेकर

हमारे देश में बजट प्रस्तुत करने की प्रक्रिया अनोखी है. वे अक्सर अपने ही पुराने प्रस्तावों को भूल जाते हैं. फिर वे नए-नए नामों से नई-नई योजनाएं जोड़ते रहते हैं, जो अपने भारी-भरकम बजट से आम लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश करती हैं. किसी जादुई छूमंतर की तरह, मंत्री हर क्षेत्र में आकर्षक योजनाओं की घोषणा करते हैं और उस क्षेत्र से जुड़े लोग सपने देखने लगते हैं.

जब तक इन योजनाएं के क्रियान्वित होने का समय आता है और ये संबंधित लोगों में अधिक स्पष्टता के साथ उम्मीद जगाती हैं, तब तक वित्त मंत्री के कार्यालय या नीति आयोग में अगले वर्ष के लिए ‘जनहितकारी योजनाओं’ का एक और ढांचा तैयार हो जाता है. यह अंतहीन चक्र चलता रहता है, और इस खेल में माहिर बाबू लोग बड़ी-बड़ी बजटीय योजनाएं पेश कर इसका पूरा ध्यान रखते हैं कि मतदाता ‘निराश’ न होने पाएं.

शहरी विकास के लिए एक और भव्य योजना की घोषणा की गई है, जिसकी लागत एक लाख करोड़ रु. है - अर्बन चैलेंज फंड. यह फंड पिछले वित्त वर्ष में अप्रयुक्त बताए गए और लगभग समान आकार के पिछले फंडों के अतिरिक्त है. पर इस पर कोई सवाल नहीं उठाया गया. वहीं, बाजार के समर्थन से सुधार-आधारित बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए यह नया फंड शुरू किया गया है. इसे एक क्रांतिकारी बदलाव बताया जा रहा है.

दरअसल, पिछले बजट की तुलना में इस वर्ष (2025-26) के शहरी बजट में 11.2 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है, यानी कुल बजटीय आवंटन में 11 प्रतिशत की सीधी कमी आई है, जो कि इस वित्तीय वर्ष में 85.5 हजार करोड़ रुपए है. बहुचर्चित अमृत योजना के आवंटन में भी 20 प्रतिशत की गिरावट आई है.

सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास के लिए धन के अंधाधुंध आवंटन के माध्यम से शहरों को अभूतपूर्व प्रोत्साहन दिया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत का कोई भी शहर विश्वस्तरीय या रहने योग्य शहरों के सूचकांक के आसपास भी नहीं पहुंच पा रहा है. बेंगलुरु, भोपाल, वडोदरा या वाराणसी में पिछले 11 वर्षों में कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिखाई दिया है. वाराणसी का गौरव और धरोहर मणिकर्णिका घाट में शर्मनाक तरीके से तोड़फोड़ किया जाना इस प्राचीन शहर की प्रशासनिक व्यवस्था पर एक धब्बा है. प्रत्येक शहर की अपनी चुनौतियां हैं जहां स्थानीय स्तर पर निर्माण कार्य कभी समाप्त ही नहीं होता, और धूल और मलबे की समस्या भी बनी रहती है. कोई भी योजना इसे हल करने में सक्षम नहीं है.

मोदी सरकार में 11 वर्षों में इस विभाग के तीन कैबिनेट मंत्री रहे हैं - वेंकैया नायडू, हरदीप पुरी और मनोहरलाल खट्टर. इनमें से कोई भी शहरी मामलों का विशेषज्ञ नहीं था. नायडू ने स्मार्ट सिटी परियोजना शुरू की और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय का निराशाभरा प्रदर्शन सभी को ज्ञात है.

दुख की बात है कि मिशन के अंतर्गत निर्मित 100 स्मार्ट शहरों में से एक भी ‘स्मार्ट’ नहीं बन सका. संसद को बताया गया कि स्मार्ट सिटी परियोजना को जब आधिकारिक तौर पर बंद किया गया, तब तक केवल 16 प्रतिशत कार्य ही पूरे हुए थे. यह कितनी बड़ी विफलता और धन की बर्बादी है! चूंकि ग्रामीण विकास का माॅडल असफल साबित हुआ लगता है, इसलिए शहरी क्षेत्रों में प्रवासन बड़े पैमाने पर हो रहा है जिसे सरकार संभाल नहीं पा रही है.

इस प्रकार ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से नई योजनाएं विफल हो जाती हैं और पुरानी योजनाएं ध्वस्त हो जाती हैं.समयबद्ध कार्यान्वयन का अभाव इसका सबसे बड़ा कारण है. स्मार्ट शहरों के लिए निर्धारित समय सीमा को दो बार बढ़ाया गया, फिर भी राज्य सरकारें लक्ष्य हासिल नहीं कर सकीं. सार्वजनिक धन की भारी बर्बादी के लिए किसी भी अधिकारी या मंत्री को कठघरे में खड़ा नहीं किया गया.

भोपाल और इंदौर भी बीआरटीएस के बेहतरीन उदाहरण हैं. शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए कुछ साल पहले इस महंगे रैपिड बस ट्रांजिट सिस्टम को शुरू किया था और उनके उत्तराधिकारी मोहन यादव ने इसे अचानक बंद करवा दिया. दोनों ही मामलों में, जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है, क्योंकि उनके पास परिवहन की कोई सुविधा नहीं बची है.

उनके टैक्स के पैसे का दुरुपयोग हुआ और उसे बेहिसाब खर्च किया गया. कोई जवाबदेही तय नही हुई . अधिकांश शहरों में जमीन में पानी के पुनर्भरण या गर्मी को नियंत्रित करने की खातिर खुली जगहें नहीं छोड़ी जाती हैं. शहरी योजनाकारों द्वारा शहरी खुले मैदानों व बड़े बगीचों के महत्व को न समझना अक्षम्य है. हमारे शहरों में इंच-इंच जमीन पर कांक्रीट बिछाई जा रही है जो खतरनाक है.  

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