West Bengal Elections 2026: कोई सात साल पहले मई 2019 में पश्चिम बंगाल के उत्तर चौबीस परगना इलाके में भाटपाड़ा से ममता बनर्जी का काफिला गुजर रहा था. सड़क किनारे खड़े कुछ युवाओं ने जय श्रीराम का नारा लगा दिया. जैसे ही श्रीराम का नाम उनके कानों तक पहुंचा, उन्होंने अपनी कार रुकवाई और युवाओं पर भड़क उठीं. उन्होंने उन युवाओं को बाहरी व्यक्ति और भाजपा का गुंडा कहा. ममता के तेवर तीखे थे और वो युवा सकपका गए! उस दृश्य को पूरे भारत ने देखा. जनवरी 2021 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद थे. उत्साहित भीड़ में से कुछ लोगों ने जय श्रीराम के नारे लगा दिए.
नारे सुनकर ममता बनर्जी इतना भड़क गईं कि उन्होंने भाषण देने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि जय श्रीराम का नारा लगाकर उनका अपमान किया गया है. तीसरी घटना दिसंबर 2022 की है. अवसर था हावड़ा रेलवे स्टेशन पर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन के उद्घाटन का. वहां भी कुछ लोगों ने जय श्रीराम का नारा लगा दिया.
श्रीराम की जयजयकार सुनकर वे इतना नाराज हुईं कि मंच पर आने से ही इनकार कर दिया. हालांकि इन तीनों ही मौकों पर उन्होंने बड़े साफ शब्दों में कहा कि जय श्रीराम के नारे से उन्हें कोई परहेज नहीं है बल्कि उनके गुस्से कारण यह है कि भारतीय जनता पार्टी के लोग इस नारे का राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं.
और चौथी घटना 4 मई 2026 की! वोटों की गिनती के साथ जब यह स्पष्ट होने लगा कि ममता की गद्दी जा रही है और पश्चिम बंगाल की गद्दी पर पहली बार भाजपा आ रही है तो कुछ युवा ममता के निवास पर पहुंच गए और चिढ़ाने वाले अंदाज में जय श्रीराम का नारा लगाया. वे गए तो महिलाओं का एक समूह नारे लगाता हुआ पहुंच गया.
मगर इस बार ममता ऐसी स्थिति में नहीं थीं कि वे घर से बाहर निकलें और अपने चिर-परिचित गुस्सैल अंदाज में जय श्रीराम का नारा लगाने वालों को लताड़ लगा पाएं! देखते ही देखते वक्त कितना बदल गया!चुनाव परिणाम आने से काफी पहले भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा कर दी थी कि 4 मई को जैसे ही वोटों का पिटारा खुलेगा, ममता दीदी टाटा-बाय बाय हो जाएंगी.
मगर ममता बनर्जी क्या सोच रही थीं? क्या उन्हें अपनी जमीन खिसकती हुई लग रही थी? कहना मुश्किल है क्योंकि ऊपरी तौर पर तो वे केंद्रीय हस्तक्षेप पर हमला कर रही थीं लेकिन यह विश्वास भी जता रही थीं कि वे चौथी बार सत्ता में लौटेंगी. तो फिर चूक कहां हो गई? इसे समझने के लिए ममता बनर्जी की उस शैली को समझना होगा जिसकी बदौलत उन्होंने 34 साल जमी वामपंथी सरकार को 2011 में उखाड़ फेंका था. भाजपा ने बड़े सधे अंदाज में ममता की शैली को ही माध्यम बनाया.
मुहावरे की भाषा में कह सकते हैं कि भाजपा ने कांटे से कांटा निकाला! चलिए, थोड़ा पीछे लौटते हैं और याद करते हैं वामपंथियों के राज को! पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का एक ऐसा नेक्सस पैदा हो गया था जिसने पूरे सिस्टम को दबोच लिया था. वामपंथी कार्यकर्ताओं की समानांतर सरकार चलती थी. इसे सामान्य भाषा में गुंडागर्दी का राज कह सकते हैं.
लोग डरते थे. वामपंथी जैसा चाहते थे, परिणाम प्राप्त कर लेते थे. ऐसे में लोगों को जरूरत एक ऐसे नेतृत्व की थी जो वामपंथियों की ईंट से ईंट बजा सके. कांग्रेस में वो ताकत नहीं थी, इसलिए वह कमजोर होती चली गई. ऐसे में सामने आईं फायर ब्रांड ममता बनर्जी. उनके तीखे तेवरों और निडरता ने उनके प्रति पश्चिम बंगाल के लोगों में उम्मीद जगाई.
खासकर 2007 में सिंगूर में टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए और नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ममता बनर्जी ने उग्र आंदोलन किया. नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मौत हुई. इससे वामपंथियों के खिलाफ माहौल बन गया. इधर ममता ने ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देकर खुद को बंगाल की बेटी के रूप स्थापित कर लिया.
वामपंथियों का साथ देने वाला ‘भद्रलोक’ यानी बौद्धिक वर्ग वामपंथियों की गुंडागर्दी से नाराज हो चुका था. उसे ममता में उम्मीद नजर आई. उस साल ममता ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया ताकि वोट न बंटे और फिर ममता सत्ता में आईं तो ऐसी छा गईं कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाया जा सकता है.
मगर दुर्भाग्य से वे भी उसी राह पर चल निकलीं, जिस राह पर वामपंथी चले और डूब गए! ममता की तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का ऐसा नेक्सस तैयार हो गया जिस पर दबदबे के लिए कुछ भी करने के आरोप लगने लगे. इधर ममता ने भाजपा की धार्मिक गोटी के खिलाफ गैरहिंदू वोटों को हर हाल में अपने पाले में रखने के लिए कुछ भी करने की ठान ली.
भाजपा को पता था कि टीएमसी के नेटवर्क से आम आदमी परेशान है. उसे कोई विश्वास दिलाने वाला चाहिए कि वो उनकी रक्षा कर सकता है. पश्चिम बंगाल का ‘भद्रलोक’ यानी बौद्धिक वर्ग कभी भी धर्म की राह पर नहीं चलता लेकिन कानून व्यवस्था के बुरे हालात उसके लिए प्रमुख मुद्दा था. उसे भाजपा में उम्मीद नजर आई. यदि आप विश्लेषण करें तो कोलकाता शहर का जो इलाका भद्रलोक कहलाता है,
वहां से ममता की पार्टी का सफाया हो गया है. क्रांतिकारी विचारों वाले भद्रलोक में कमल खिलना वाकई हैरत पैदा करता है. मगर भाजपा ने यह कर दिखाया और ममता यह समझ ही नहीं पाईं कि जिस कांटे से उन्होंने वामपंथ का कांटा निकाला था, भाजपा ने उसी कांटे से उन्हें ही निकाल बाहर किया.
पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार में आना भाजपा के लिए निश्चय ही बड़ी बात है लेकिन उसे भी ध्यान रखना होगा कि नीचे के स्तर पर कहीं उसके कार्यकर्ता भी वैसा ही नेक्सस न बना लें जैसा वामपंथियों या फिर ममता ने बनाया था. पश्चिम बंगाल के लोग किसी भी तरह का नेक्सस बर्दाश्त नहीं करते हैं. भद्रलोक को गुस्सा तो पसंद है लेकिन गुंडागर्दी नहीं!