4 मई 2026 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज?, हिंदू और हिंदी विरोध खा गया स्टालिन को?
By विवेक शुक्ला | Updated: May 5, 2026 05:07 IST2026-05-05T05:07:35+5:302026-05-05T05:07:35+5:30
भूकंप का एक बड़ा कारण स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन का हिंदू तथा हिंदी विरोध है, जिसने डीएमके को खा लिया.

file photo
तमिलनाडु के लिए चार मई 2026 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होगा. अभिनेता-राजनेता जोसेफ विजय की तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने राज्य विधानसभा पर कब्जा जमा लिया. सत्तासीन डीएमके तीसरे स्थान पर सिमट गई है, जबकि एआईएडीएमके दूसरे पर. मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन खुद कोलाथुर सीट से हार गए हैं. यह महज एक नई पार्टी की शुरुआती सफलता नहीं, बल्कि द्रविड़ पार्टियों के लंबे वर्चस्व का अंत है. और इस भूकंप का एक बड़ा कारण स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन का हिंदू तथा हिंदी विरोध है, जिसने डीएमके को खा लिया.
टीवीके की यह शानदार सफलता संयोग नहीं. पार्टी की स्थापना 2024 में हुई थी. विजय, जिन्हें उनके प्रशंसक ‘थलापति’ कहते हैं, ने राजनीति में कदम रखते ही साफ संदेश दिया-भ्रष्टाचारमुक्त तमिलनाडु, नशामुक्त राज्य, युवाओं और महिलाओं का सशक्तिकरण. उन्होंने द्रविड़ दलों के पारंपरिक ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ विभाजन से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा और रोजगार पर फोकस किया.
23 अप्रैल 2026 को हुए चुनाव में 85 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज हुआ, जो तमिलनाडु के इतिहास में अभूतपूर्व है. युवा और महिलाएं इस बार टीवीके के प्रति आकर्षित हुए. विजय की फिल्मी छवि ने उन्हें ‘आम आदमी का नायक’ बना दिया. लेकिन टीवीके की इस सफलता का एक और गहरा आयाम है-डीएमके की नीतिगत और वैचारिक विफलता.
स्टालिन सरकार ने अपने शासनकाल में हिंदू विरोध और हिंदी विरोध को अपनी पहचान बना लिया. 2023 में उदयनिधि स्टालिन ने ‘सनातन धर्म’ को मच्छर, डेंगू और कोविड की तरह ‘समाप्त’ करने की बात कही थी. उन्होंने इसे ‘दमनकारी व्यवस्था’ बताया. डीएमके ने इस बयान से दूरी नहीं बनाई, बल्कि इसे सनातन के खिलाफ अपनी पुरानी द्रविड़ आंदोलन की विरासत से जोड़ा.
भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इसे ‘हिंदू विरोध’ का प्रतीक बना दिया. तमिलनाडु की हिंदू बहुल आबादी, खासकर मध्यम वर्ग और ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं ने इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान पर हमला माना. 2026 के चुनाव में यह मुद्दा उभरा. इसी तरह हिंदी विरोध ने भी डीएमके को नुकसान पहुंचाया.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तीन भाषा फॉर्मूले को स्टालिन और उदयनिधि ने ‘हिंदी थोपने की साजिश’ बताया. चुनाव से पहले स्टालिन ने बार-बार कहा कि ‘हिंदी के लिए तमिलनाडु में कोई जगह नहीं- कल, आज और कल भी नहीं.’ हिंदी विरोध की ऐतिहासिक जड़ें 1930-60 के आंदोलनों में हैं,
लेकिन 2026 में युवा पीढ़ी इसे पुराना और अनावश्यक मानती है. आज तमिलनाडु के युवा आईटी, इंजीनियरिंग और स्टार्टअप्स में काम कर रहे हैं. वे अंग्रेजी के साथ हिंदी को अवसर मानते हैं, न कि खतरा. डीएमके का सख्त रुख उन्हें अलग-थलग महसूस कराता था.