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UP Wolf Horror: भेड़िये आखिर क्यों बन रहे हैं नरभक्षक? 

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: September 12, 2024 06:14 IST

UP Wolf Horror: चार सितंबर को जब बीते 48 घंटों में छह बार भेड़िये के हमले की सूचना आई तो राज्य सरकार ने गोली मारने के आदेश दे दिए.

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ठळक मुद्देजंगल महकमे के लोग घाघरा नदी के कछार में चप्पा-चप्पा छन रहे हैं.भेड़िया नहीं मिल रहा जिसके सिर इतनी हत्या हैं. भारतीय भेड़िया (कैनिस ल्यूपस पैलिप्स) भूरे भेड़िये की एक लुप्तप्राय उप-प्रजाति है.

UP Wolf Horror: भारत में बच्चों को भेड़िये का परिचय रुडयार्ड किपलिंग की किताब ‘जंगल  बुक’ से मिला, जिसमें भेड़िये जंगल में एक इंसान के बच्चे को पालते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के बहराइच में भेड़िये का खौफ शेर से अधिक है. बीते कुछ दिनों में नौ बच्चों सहित दस लोग भेड़िये का शिकार हुए हैं. कुछ गांवों से पलायन शुरू हो गया है. जंगल महकमा अभी तक चार भेड़ियों को पिंजरे में डाल चुका है लेकिन अंधेरा होते ही भय, अफवाह और कोहराम थमता नहीं. चार सितंबर को जब बीते 48 घंटों में छह बार भेड़िये के हमले की सूचना आई तो राज्य सरकार ने गोली मारने के आदेश दे दिए.

अब ड्रोन, थर्मल कैमरा सहित अत्याधुनिक मशीनों से लैस जंगल महकमे के लोग घाघरा नदी के कछार में चप्पा-चप्पा छन रहे हैं लेकिन वह भेड़िया नहीं मिल रहा जिसके सिर इतनी हत्या हैं. अब करीबी लखीमपुर और यहां से दूर मैनपुरी जिले में भेड़िये के हिंसक होने के समाचार हैं. वैसे भारतीय भेड़िया (कैनिस ल्यूपस पैलिप्स) भूरे भेड़िये की एक लुप्तप्राय उप-प्रजाति है.

जो भारतीय उपमहाद्वीप और इजराइल तक विस्तृत क्षेत्र में पाई जाती है. चिड़ियाघरों में कोई 58 भेड़िये हैं जबकि सारे देश में 55 प्रजाति के तीन हजार से काम भेड़िये ही बचे हैं. आम तौर पर भेड़िये इंसान से डरते हैं और मनुष्यों पर हमला करना दुर्लभ है. भेड़ियों को मार देना या कैद कर लेना एक तात्कालिक विकल्प तो है.

लेकिन गहरे जंगल और गन्ने की सघन खेती वाले बहराइच में जानवर का नरभक्षी बन जाना इंसान-जानवरों के टकराव की ऐसी अबूझ पहेली है जिसका हल नहीं खोजा गया तो यह समस्या विस्तार ले सकती है. यदि जंगल के पिरामिड को समझें तो  सबसे गहन वन में, जहां पेड़ों की ऊंचाई के कारण उजाला कम पहुंचता है, निशाचर जानवरों जैसे चमगादड़ आदि का पर्यावास होता है.

फिर सामान्य पेड़ और ऊंची झाड़ियों वाले जंगल आते हैं जहां मांसभक्षी जानवर जैसे बाघ, तेंदुआ आदि अपने-अपने दायरों में रहते हैं. उसके बाद हिरण, खरगोश, भालू, हाथी  आदि  जो कि वनस्पति से पेट भरते हैं. मांसभक्षी जानवरों को जब भूख लगती है तो वे अपने दायरे से बाहर निकाल कर शिकार करते हैं.

उनके भोजन से बचे हुए हिस्से का दायरा बस्ती और जंगल के बीच का होता है, जहां चरागाह भी होते हैं और बिलाव, लोमड़ी, भेड़िये जैसे जानवरों के पर्यावास, जो कि मांसभक्षी जानवरों द्वारा छोड़ी गई गंदगी की सफाई कर अपना पेट भरते हैं. यदाकदा इंसानों के जानवरों- गाय, बकरी और कुत्ता भी पकड़ लेते हैं.

समझना होगा कि कोई भी जानवर इंसान या अन्य जानवर पर यूं ही हमला नहीं करता–या तो वह भोजन के लिए या फिर भय के चलते ही हमलावर होता है. यदि बारीकी से देखें तो जंगल के पिरामिड तहस-नहस हो गए और अब कम घने जंगल में रहने वाले मांसाहारी जानवर भी बस्ती के पास आ रहे हैं.

जब उनके लिए भोजन की कमी होती है तो उनके छोड़े पर पलने वाले भेड़िये, सियार आदि तो भूखे रहेंगे ही और चूंकि ये इंसानी बस्ती के करीबी सदियों से रहे हैं तो यहां से भोजन लूटने में माहिर होते हैं. जब भेड़िये को बस्ती में उसके लायक छोटा  जानवर नहीं मिलता तो वह छोटे बच्चों को उठाता है और एक बार उसे मानव-रक्त का स्वाद लग जाता है तो वह उसके लिए पागल हो जाता है.

टॅग्स :उत्तर प्रदेशForest Departmentलखनऊ
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