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हरीश गुप्ता का ब्लॉग: पहेली बना आरएसएस-भाजपा का संबंध

By हरीश गुप्ता | Updated: June 6, 2024 08:58 IST

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा 543 सदस्यों वाली लोकसभा में 272 सीटों के जादुई आंकड़े से चूक गई, जिससे मोदी के लाखों प्रशंसकों को झटका लगा होगा.

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ठळक मुद्देसंघ परिवार के कई लोगों का मानना है कि इस तरह की परिस्थिति के लिए भाजपा नेतृत्व ही जिम्मेदार है. उनका कहना है कि भाजपा ने आरएसएस नेताओं द्वारा दी गई शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अपना वोट डालने के लिए शहर में ही थे, लेकिन इस मुद्दे पर सस्पेंस अभी भी बना हुआ है.

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा 543 सदस्यों वाली लोकसभा में 272 सीटों के जादुई आंकड़े से चूक गई, जिससे मोदी के लाखों प्रशंसकों को झटका लगा होगा. लेकिन संघ परिवार के कई लोगों का मानना है कि इस तरह की परिस्थिति के लिए भाजपा नेतृत्व ही जिम्मेदार है. उनका कहना है कि भाजपा ने आरएसएस नेताओं द्वारा दी गई शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया. 

उन्होंने भाजपा को ग्रामीण इलाकों में किसानों के संकट और अन्य कमजोरियों से अवगत कराया था और आग्रह किया था कि बिना देरी किए इस पर ध्यान दिया जाए. लेकिन भाजपा अति-आत्मविश्वास में थी और अपनी ही दुनिया में जी रही थी. आरएसएस 2004 के उस पल को दोहराता जाता देख रहा था, जब अटल बिहारी वाजपेयी ‘इंडिया शाइनिंग’ की लहर पर सवार थे और मुट्ठी भर लोकसभा सीटों से चूक गए थे. 

2024 में, भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 20 साल बाद वही किया और आसमान छूते शेयर बाजार पर भरोसा किया. उसने ‘अबकी बार ... 400 पार’ करके इतिहास रचने का दावा किया. अति उत्साह में भाजपा ने राज्यों में पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व की परवाह नहीं की और उनमें से कुछ को अपमानित भी किया गया. लोकसभा के टिकट पुरानी परंपरा के अनुसार अन्य हितधारकों की सिफारिशों को नजरअंदाज कर मनमाने ढंग से बांटे गए. 

यहां तक कि जिला स्तर पर भाजपा में प्रतिनियुक्त आरएसएस प्रचारकों की राय लेने की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई. इसी पृष्ठभूमि में एक रिपोर्ट सामने आई कि आरएसएस और भाजपा के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. 19 अप्रैल को नागपुर में जब प्रधानमंत्री मोदी राजभवन में रात्रि विश्राम कर रहे थे, उस समय जो कुछ हुआ, उस पर कोई भी टिप्पणी करने को तैयार नहीं था. 

दागी नेताओं के लिए खुले दरवाजे की नीति और पार्टी के वफादारों की अनदेखी की भाजपा की आक्रामक रणनीति से आरएसएस नेतृत्व चिंतित था. प्रचंड बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा की अलग हटकर बनी छवि से समझौता किया गया. हालांकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अपना वोट डालने के लिए शहर में ही थे, लेकिन इस मुद्दे पर सस्पेंस अभी भी बना हुआ है.

नड्डा का संदेश

इन सबके बीच एक और बात तब सामने आई जब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लोकसभा चुनाव के बीच एक इंटरव्यू में कहा कि पार्टी को शुरुआती दौर में आरएसएस की जरूरत थी. उन्होंने कहा, ‘अब जब पार्टी बड़ी और सक्षम हो गई है, तो भाजपा अपने दम पर चल सकती है.’ यह आरएसएस को साफ संदेश था कि भाजपा को अपने राजनीतिक कामों में मदद करने के लिए अब उसके प्रचारकों की जरूरत नहीं है. 

पिछले कुछ महीनों से भाजपा महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष का मीडिया की नजरों से गायब रहना काफी हद तक इसी वजह से हो सकता है. संघ परिवार के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा भाजपा सरकार को निर्णय लेने की प्रक्रिया में पीछे से किसी की भूमिका पसंद नहीं आई. आरएसएस इसका वैचारिक मार्गदर्शक बना रहेगा, लेकिन इसकी रोजमर्रा की गतिविधियों में इसकी कोई भूमिका नहीं होगी. 

कहा जाता है कि इन चुनावों में भी आरएसएस कार्यकर्ताओं ने कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई. 1952 में जब से आरएसएस ने भारतीय जनसंघ के नाम से अपनी राजनीतिक शाखा शुरू की है, तब से यह पहली बार है जब उसने उम्मीदवारों के चयन और संबंधित गतिविधियों सहित चुनाव प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं निभाई है. लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ा झटका मिलने के बाद, उनके भविष्य के रिश्ते पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है.चुनाव आयोग ने मानी गलती!

मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने 45 दिनों तक चलने वाले अब तक के सबसे लंबे लोकसभा चुनाव कराने में अपनी गलती स्वीकार कर ली है. देश के संसदीय इतिहास में दूसरी बार हुआ कि आधुनिकतम तकनीक होने के बावजूद यह अत्यधिक लंबा चुनाव था. भारत को 1947 में जब स्वतंत्रता मिली थी, उसके बाद 1952 में पहला आम चुनाव 25 अक्तूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच हुआ था. 

लेकिन राजीव कुमार यह बताने में विफल रहे कि उन्होंने भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी ‘रेड अलर्ट’ की अनदेखी क्यों की, जिसमें कहा गया था कि मई के मध्य से उत्तर भारत के कई राज्यों में भीषण गर्मी पड़ेगी. वे लोकसभा चुनाव एक महीने पहले करा सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और इसके कारण अप्रैल-मई के दौरान चुनाव आयोग की ड्यूटी पर तैनात लोगों की मौत हो गई. भले ही उन्हें समझ में आ गया हो, लेकिन नुकसान हो चुका है.

हर कोई मना रहा है जश्न!

18 वीं लोकसभा के नतीजों ने लगभग सभी को खुश होने का मौका दे दिया है. भाजपा खुश है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी इस जीत का श्रेय पार्टी और एनडीए को दे रहे हैं. पार्टी के पुराने वफादार नेता खुश हैं क्योंकि अब उनकी आवाज सुनी जा सकती है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास भी मुस्कुराने का मौका है क्योंकि 2019 के मुकाबले भाजपा ने जो 29 लोकसभा सीटें खो दी हैं, उसमें उम्मीदवारों के चयन में उनकी कोई अहम भूमिका नहीं थी. 

कांग्रेस खुश है कि उसने वापसी की और राहुल गांधी ने अपनी काबिलियत साबित कर दी है. भाजपा के सहयोगी खुश हैं कि भाजपा अब ‘गठबंधन धर्म’ का पालन कर सकती है. हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल समेत जेल में बंद विपक्षी नेताओं को ‘ईश्वरीय न्याय’ मिलने की उम्मीद है. 

पंजाब में अकाली दल जैसी कई क्षेत्रीय पार्टियों को भाजपा ने किनारे कर दिया था, लेकिन उनके पास मुस्कुराने का मौका है क्योंकि भगवा पार्टी वहां एक भी सीट नहीं जीत पाई. हरियाणा और कुछ अन्य राज्यों में जेजेपी के लिए भी यही बात लागू होती है. महाराष्ट्र में भी सभी के पास मुस्कुराने का मौका है. आखिरकार ईवीएम ने सभी आरोपों को खत्म करते हुए लंबी लड़ाई जीत ली है.

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