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जयंतीलाल भंडारी का ब्लॉग: मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ रहा देश

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 9, 2022 15:07 IST

कोविड-19 के बीच चीन के प्रति बढ़ी हुई वैश्विक नकारात्मकता और वर्ष 2022 में चीन में कोरोना संक्रमण के कारण उद्योग-व्यापार के ठहर जाने से चीन से बाहर निकलते विनिर्माण, निवेश और निर्यात के मौके भारत की ओर आने लगे हैं.

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ठळक मुद्देभारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में दुनिया के विभिन्न देशों का अच्छा सहयोग और समर्थन मिल रहा है.अब देश के कुछ उत्पादक चीन के कच्चे माल का विकल्प बनाने में सफल भी हुए हैं.यह माना जा रहा है कि भारत सस्ती लागत के विनिर्माण में चीन को पीछे छोड़ सकता है.

इस समय दुनिया के बदले हुए आर्थिक और भूराजनीतिक परिदृश्य के बीच भारत दुनिया का नया मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की संभावनाओं को तेजी से मुट्ठियों में लेते हुए दिख रहा है.

मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के चार प्रमुख कारण दिखाई दे रहे हैं. एक, देश में आत्मनिर्भर भारत अभियान और उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) को तेजी से प्रोत्साहन.

दो, कोविड-19 की वजह से चीन के प्रति वैश्विक नकारात्मकता के बाद अब चीन में कोविड संक्रमण के कारण उत्पादन ठप होने और सप्लाई चेन बाधित होने से वैश्विक उद्योग और वैश्विक पूंजी का भारत के दरवाजे पर तेजी से दस्तक देना.

तीन, भारत की अर्थव्यवस्था का तेजी से निर्यात आधारित बनने की प्रवृत्ति. चार, भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डॉयलॉग (क्वाड) के कारण उद्योग-कारोबार का तेजी से बढ़ना.

गौरतलब है कि 6 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से ‘जीतो कनेक्ट 2022’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मनिर्भर भारत हमारा रास्ता भी है और संकल्प भी.

इस समय वोकल फार लोकल को बढ़ावा और विदेशी वस्तुओं के उपयोग को कम करने के साथ देश में प्रतिभा, उद्योग, व्यापार और प्रौद्योगिकी को तेजी से प्रोत्साहित किया जा रहा है.

दुनिया भारत के उत्पादों की तरफ भरोसे से देख रही है और भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में दुनिया के विभिन्न देशों का अच्छा सहयोग और समर्थन मिल रहा है. उल्लेखनीय है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान में मैन्युफैक्चरिंग के तहत 24 सेक्टर को प्राथमिकता के साथ तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है.

चूंकि अभी भी देश में दवाई उद्योग, मोबाइल उद्योग, चिकित्सा उपकरण उद्योग, वाहन उद्योग तथा इलेक्ट्रिक जैसे कई उद्योग बहुत कुछ चीन से आयातित माल पर आधारित हैं, ऐसे में चीन के कच्चे माल का विकल्प तैयार करने के लिए पिछले डेढ़ वर्ष में सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (पीएलआई) स्कीम के तहत 13 उद्योगों को करीब दो लाख करोड़ रुपए आवंटन के साथ प्रोत्साहन सुनिश्चित किए हैं.

अब देश के कुछ उत्पादक चीन के कच्चे माल का विकल्प बनाने में सफल भी हुए हैं. पीएलआई योजना से अगले पांच वर्षों में देश में 520 अरब डॉलर यानी लगभग 40 लाख करोड़ रु. मूल्य की वस्तुओं का उत्पादन होगा.

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि कोविड-19 के बीच चीन के प्रति बढ़ी हुई वैश्विक नकारात्मकता और वर्ष 2022 में चीन में कोरोना संक्रमण के कारण उद्योग-व्यापार के ठहर जाने से चीन से बाहर निकलते विनिर्माण, निवेश और निर्यात के मौके भारत की ओर आने लगे हैं.

यह माना जा रहा है कि भारत सस्ती लागत के विनिर्माण में चीन को पीछे छोड़ सकता है. भारत में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाले कम लागत के उत्पाद बनाए जा सकेंगे और विनिर्माण उद्योग जितनी अधिक बिक्री करेंगे, उससे अर्थव्यवस्था में उतने ही अधिक रोजगार सृजित होंगे.

भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है. भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है. केंद्र सरकार ने उद्योग-कारोबार, करारोपण और विभिन्न श्रम कानूनों को सरल बनाया है. इससे भी उद्योग-कारोबार आगे बढ़ रहे हैं.

निस्संदेह दुनिया का दूसरा बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को पाने के लिए भारत को कई बातों पर ध्यान देना होगा. आत्मनिर्भर भारत अभियान और मेक इन इंडिया को सफल बनाना होगा. मैन्युफैक्चरिंग के प्रोत्साहन के लिए लागत घटाने के प्रयास के साथ स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शोध एवं नवाचार पर फोकस करना होगा.

टॅग्स :भारतइकॉनोमीमेक इन इंडिया
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